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ऐसा क्या प्रेरणादायी काम किया कि मरने के बाद भी आाएगी देह किसी के काम

मृत्यु के बाद भी ये नश्वर देह किसी के काम तो आए जीने का मकसद पूरा हो जाएगा। परम्पराओं से परे हटकर मानवता की सेवा के लिए देह का दान तो करना ही होगा।
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chittorgarh

देहदान का संकल्प पत्र सौंपते डगवार परिवार के तीन सदस्य।


चित्तौडग़ढ़. मृत्यु के बाद भी ये नश्वर देह किसी के काम तो आए जीने का मकसद पूरा हो जाएगा। परम्पराओं से परे हटकर मानवता की सेवा के लिए देह का दान तो करना ही होगा। ऐसा करने पर ही चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों को शोध के लिए पर्याप्त मानव देह मिल पाएगी। ये विचार सोमवार को
चित्तौडग़ढ़ में एक ही परिवार के तीन लोगों सहित चार जनों ने देहदान का संकल्प पत्र भर अनुकरणीय उदाहरण समाज के लिए पेश करने के दौरान उभरकर आए। देहदान के ये संकल्प पत्र उदयपुर के रविन्द्रनाथ टेगोर मेडिकल कॉलेज के एनॉटोमी विभाग में जमा किए जाएंगे। देहदान का संकल्प लेने वालों में स्कूली शिक्षा के सेवानिवृत प्राचार्य राजमल डगवार, उनके पुत्र मेडिकल स्टोर संचालक प्रशान्त डगवार व पुत्रवधु अनुराधा डगवार के साथ हिन्दुस्तान जिंक के चंदेरिया प्लान्ट में फोरमेन किरण मेहरा शामिल थे। आचार्य श्रीतुलसी ब्लड फाउण्डेशन के अध्यक्ष सुनील ढीलीवाल ने संकल्प पत्र भरवाए। ये संकल्प पत्र ढीलीवाल एनॉटोमी विभाग में जमा कराएंगे।
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एक के मन में आए भाव तो सभी हो गए तैयार
डगवार परिवार के फार्मा शिक्षा प्राप्त प्रशान्त के मन में सबसे पहले देहदान का विचार आया। उनको लगा कि मानव देह किसी के काम आए तो इसकी सार्थकता अधिक होगी। उन्होंने इस विचार को फार्मा व्यवसाय में साथ देने वाली पत्नी अनुराधा के साथ सांझा किया तो वे भी इस पहल में कदम साथ मिलाने को तैयार हो गई। बेटे-बहू के संकल्प को जान करीब १६ वर्ष पहले सेवानिवृत होने वाले ७४ वर्षीय पिता राजमल डगवार ने भी देहदान का संकल्प जताया। उन्होंने कहा कि वे ये बात सोच तो वर्षो से रहे थे लेकिन जाहिर नहीं कर पाए। प्रशान्त-अनुराधा के बच्चों ने भी माता-पिता के संकल्प को सराहा।
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चिकित्सकों को शोध के लिए देह तो मिले
तकनीकी शिक्षा पाने के बाद जिंक में फोरमेन ५३ वर्षीय किरण मेहरा निरंकारी मिशन से जुड़े होने के कारण सेवा का भाव रखते रहे। मेहरा के अनुसार विकसित देशों में जहां एक चिकित्सक के पास एक देह शोध के लिए होती है वहीं भारत में करीब ५०० चिकित्सकों के उपर एक मानव देह मिल पाती है। ऐसे में चिकित्सा विज्ञान में शोध भी प्रभावित हो रहे। उनका मानना था कि मरने के बाद पार्थिव देह जलकर धुएं व राख में बदल जाए उससे बेहतर है कि वे मानव सेवा में कार्य आए। इसी भावना से देहदान का संकल्प लिया तो परिजनों ने भी हौंसला बढ़ाया।

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