
किस कारण धुल गया मादक दूध
चित्तौडग़ढ़.जिले में मौसम में आए बदलाव और कुछ जगह बारिश ने अफीम की फसल को गर्त में डाल दिया है। जिन अफीम उत्पादकों ने डोडों को चीरे लगा दिए हैं, उनमें से निकले मादक दूध को बारिश के पानी ने बहा दिया है। मौसम में नमी के चलते अब किसानों को दोहरी मार पडऩे वाली है। पहली प्रकृति की और दूसरी फफूंदजनित रोग काली मस्सी की।
चित्तौडग़ढ़, कपासन, सेमलपुरा सहित विभिन्न स्थानों पर बोई गई फसल में डोडों को चीरे लगाने का काम शुरू हो चुका है। काश्तकारों को आस थी कि इस बार अफीम की अच्छी पैदावार होगी, लेकिन पिछले कुछ दिनों में तेज हवा के साथ हुई बारिश से उन स्थानों पर अफीम व गेहूं की फसल आड़ी पड़ गई, जहां पिलाई की हुई है। कई जगह तेज हवा से पौधों के तने टूट गए है तो कई जगह डोडों से निकल रहा दूध बारिश के पानी के साथ बह गया है। डोडों के चीरे लगाने के बाद उनमें से दूध जैसा मादक द्रव्य निकलता है, जिसे काश्तकार बर्तन में जमा करते हैं। बाद में इसका रंग काला हो जाता है, जिसे अफीम कहते हैं। कपासन क्षेत्र में अफीम की खेती कर रहे किसानों ने बताया कि उन्होंने बुवाई के बाद अब डोडों के चीरे लगा दिए हैं।
एक डोडे पर तीन से चार बार चीरे लगाए जाते हैं। जिन किसानों ने एक बार चीरे लगा दिए हैं, वे अब मौसम को देखते हुए चीरे लगाने में विलंब करेंगे। ऐसी स्थिति में भी डोडों का दूध सूखने की आशंका रहेगी। इससे उत्पादन प्रभावित हो सकता है। प्रकृति की मार से परेशान किसान अब फसल को फिर से काली मस्सी की नजर लगने को लेकर भी चिन्ता में है। फफंूदजनित इस रोग ने अफीम उत्पादकों का दिन का चैन और रातों की नीन्द छीन ली है। जिन किसानों ने डोडों को चीरे लगा दिए है, उनकी परेशानी यह भी है कि अब वे हंकाई के लिए भी आवेदन नहीं कर सकते। इधर मौसम में नमी के चलते अफीम की फसल में काली मस्सी से डोडों के सडऩे की आशंका भी बढ गई है।
Published on:
28 Feb 2019 10:40 pm
