
चूरू. धोरों की धरती चूरू में करीब 60 साल से बन रहे मावे के पेड़ों का स्वाद इतना लाजवाब है कि इनके मुरीद विदेशों में भी हैं। समय के साथ मिठाई बनाने के तरीके बदले। लेकिन चूरू शहर में बनने वाले पेड़े आज भी पुरानी तकनीक के साथ बन रहे हैं। यही वजह है कि आधी से अधिक सदी बीत जाने के बाद भी इनके स्वाद का जादू बरकरार है। यहां पर भाईजी व हनुमानजी के पेड़े प्रसिद्ध हैं। यहां से पेड़े यूरोप सहित और खाड़ी देशों में जाते हैं। लोगों ने बताया कि करीब 60 साल पहले शहर के कुम्भाराम सैनी व डूंगरमल धूत ने ये कारीगरी कोलकाता में सीखी थी। इसके बाद शहर के पेड़े बनाने का कारोबार शुरू किया गया। अब दोनों परिवारों की नई पीढी इस विरासत को सहेजे है। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों ने बताया कि त्योहारी व शादियों की सीजन शुरू होने के साथ ही पेड़ों की मांग बढ जाती है।
मिठाई बनाने की कला ने दिलाई पहचान
भाईजी व हनुमान जी के पेड़े बनाने की कला ने इन्हें देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पहचान दिलाई। करीब 50 सालों से पेड़े बना रहे सीताराम प्रजापत ने बताया कि शहर के लोगों को इनके स्वाद ने लुभाया तो यहां के प्रवासी लोग पेड़े खरीदकर कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, दक्षिण भारत, गुजरात सहित देश के कई शहरों में ले जाने लगे। इसके अलावा जिले के कई लोग खाड़ी देशों समेत ऑस्ट्रेलिया व यूरोप लोग ले जाने लगे। ऐसे में विदेशों में भी लोग इनके स्वाद के मुरीद होने लगे। अब पेड़े कई देशों में जाते हैं।
दो तरह के बनते पेड़े
सीताराम प्रजापत ने बताया कि शहर में पेड़े दो तरह से बनाए जाते हैं। एक डबल सिकाई का व एक केसर का बनाया जाता है। मावा कारखाने में ही तैयार किया जाता है। पेड़े बनाने का काम कारीगर सुबह सात बजे से शुरू करते हैं। जो कि देर शाम तक चलता है। करीब सौ किलो पेड़े रोज बनते हैं। मावे की दो बार सिकाई करने के बाद पेड़े बनते हैं। इसके अलावा केसर के पेड़े भी मावे को खूब सेकने के बाद बनाए जाते हैं।
Published on:
30 Oct 2023 11:11 am
बड़ी खबरें
View Allचूरू
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
