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चूरू के थेपड़ा घेवर की धमक देश- विदेश तक, स्वाद में लाजवाब

थार के रेगिस्तान के प्रवेश द्वार पर बसा ढाई लाख की आबादी वाला चूरू शहर। गर्मियों में तपते धोरों व सर्दियों में बर्फ जमने वाली सर्दी के लिए तो प्रसिद्ध है ही। इसके अलावा इस शहर की एक और पहचान है, यहां की बेहद लजीज मिठाई थेपड़ा घेवर। जिसकी धमक देश ही नहीं विदेशों तक है। स्वाद ऐसा कि चखने के बाद हर कोई इसका मुरीद बन जाता है। सर्दियों में थेपड़ा घेवर की खुशबू से यहां हर गली - चौराहा महक उठता है।

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चूरू. थार के रेगिस्तान के प्रवेश द्वार पर बसा ढाई लाख की आबादी वाला चूरू शहर। गर्मियों में तपते धोरों व सर्दियों में बर्फ जमने वाली सर्दी के लिए तो प्रसिद्ध है ही। इसके अलावा इस शहर की एक और पहचान है, यहां की बेहद लजीज मिठाई थेपड़ा घेवर। जिसकी धमक देश ही नहीं विदेशों तक है। स्वाद ऐसा कि चखने के बाद हर कोई इसका मुरीद बन जाता है। सर्दियों में थेपड़ा घेवर की खुशबू से यहां हर गली - चौराहा महक उठता है।

जहां देखो उस ओर मिठाई की दुकान पर कारीगर थेपड़ा घेवर बनाते नजर आएंगे। खास बात ये है कि यह मिठाई बस एक महीने तक ही बनती है। मळमास शुरू होने के बाद मकर सक्रांति तक ये बाजारों में दिखाई देती है। इसके बाद इसका निर्माण बंद हो जाता है। इसका इतिहास भी शहर से बसने के पहले का है। हालांकि इस बात की जानकारी किसी के पास नहीं है कि इसे सबसे पहले किसने बनाया और ये कब बननी शुरू हुई।

मिठाई का इतिहास किसी नहीं पता

यहां के इतिहास के जानकार बुजुर्ग श्याम सुंदर शर्मा ने बताया कि थेपड़ा घेवर का निर्माण कब शुरू हुआ। इसके सबसे पहले किसने बनाया इसके साक्ष्य इतिहास में मौजूद नहीं है। हां इतना जरूर सामने आया है कि जब से चूरू शहर आबाद हुआ है। उससे पहले के जमाने से लेकर अब तक यह मिठाई लोगों की जुबां पर अपने स्वाद का मिठास घोल रही है।

ऐसा स्वाद कहीं नहीं

बुजुर्गों की मानें तो थेपड़ा घेवर का स्वाद चूरू शहर के अलावा कहीं नहीं मिलेगा। इसका निर्माण सिर्फ यहीं पर होता है। इसके अलावा ये कहीं नहीं बनती। श्याम सुंदर शर्मा ने बताया कि अब शेखावाटी के कई कस्बों में थेपड़ा घेवर कारीगर बनाने लगे हैं। मगर, चूरू जैसा जायका वहां नहीं मिलेगा। सबसे खास बात ये है कि थेपड़ा घेवर को गर्मागर्म ही खाया जाता है। इसकी भीनी - भीनी महक हर किसी को अपना दीवाना बना लेती है।

लोक संस्कृति में बस गई ये मिठाई

धोरों की लोक संस्कृति में इसका खास महत्व है । शहर के बुजुर्गों ने बताया कि थेपड़ा घेवर सिर्फ एक महिने के लिए बनाया जाता है। मळमास लगते ही मिठाई की दुकानों पर इसका निर्माण होने लगता है, जो कि मकर सक्रांति तक चलता है। मळमास के दौरान दान पुण्य की परंपरा है। जिसमें थेपड़ा घेवर को घरों व रिश्तेदारों में बांटते हैं।

प्रवासियों ने दिलाई पहचान

इलाके के कई लोग देश के अलग- अलग हिस्सों में कारोबार के सिलसिले के चलते बसे हैं। कई लोग विदेशों में भी रोजगार के लिए रहते हैं। ऐसे में सर्दियों के दौरान छुट्टियां बीताने आने वाले लोग थेपड़ा घेवर को दक्षिण भारत, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आसाम, बिहार, यूपी, एमपी, दिल्ली व हरियाणा लेकर जाते हैं। इसके अलावा खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भी यहां से इसे लेकर जाते हैं। यही वजह है कि थेपड़ा घेवर की धमक देश ही नही विदेशों तक है।

इस वजह से पड़ा थेपड़ा घेवर नाम

थेपड़ा घेवर बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि रात को मेदे का घोल तैयार कर छोड़ देते हैं। सुबह घोल को अच्छे से मथने के बाद कड़ाही में घी गर्म किया जाता है। इसके बाद हाथों से घोल को थोड़ा- थोड़ा करके गर्म घी में डाला जाता है। जिससे उसकी बड़ी बूंदी वाली परत बन जाती है। इसके बाद गोल परत को चासनी में कई देर तक डूबाया जाता है। फिर बाहर निकाल रख देते हैं। ये देखने में घरों जलाने के काम आने वाली गोबर से बनीं थेपड़ी जैसा दिखता है। यही वजह है कि इसका नाम पुराने समय से थेपड़ा घेवर प्रचलित है।


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