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चित्र, गीत, संगीत एवं कला की अनूठी विरासत फड़ अब ग्रामीण अंचल में ही शेष

राजस्थान के लोक देवताओं का यशोगान जिस शैली में होता है। उसे स्थानीय भाषा में फड़ बांचना कहते हैं। ये कला अब शहरों और कस्बों से तो लुप्त हो चुकी है। मगर, गांवों में ये अभी तक जिंदा है। शेखावाटी में भोपा-भोपी कपड़े पर चित्रित देवगाथा को फैला कर उसके दोनों किनारे बांध कर चित्रित दीवार बना लेते हैं।

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चूरू

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Nupur Sharma

Oct 08, 2023

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क/चूरू। राजस्थान के लोक देवताओं का यशोगान जिस शैली में होता है। उसे स्थानीय भाषा में फड़ बांचना कहते हैं। ये कला अब शहरों और कस्बों से तो लुप्त हो चुकी है। मगर, गांवों में ये अभी तक जिंदा है। शेखावाटी में भोपा-भोपी कपड़े पर चित्रित देवगाथा को फैला कर उसके दोनों किनारे बांध कर चित्रित दीवार बना लेते हैं। इसके बाद वे दीपक व धूप बत्ती जलाकर उस चित्र कथा को स्थानीय भाषा में श्रद्धालुओं को गाकर सुनाते हैं। इस दौरान नृत्य भी करते हैं। भोपा गाते समय एक छड़ी से चित्र की और संकेत करता है। शहर के लेखक संगमानंद ने बताया कि फड़ कपड़े में लिपटी रहती है। इसे खोलने के बाद दोनों तरफ डंडा या बांस बांध कर खोलते हैं। फिर पूजा कर गायन के बाद ही इसे बंद किया जाता है। उन्होंने बताया कि फड़ शब्द दरअसल पट से आया है। पुरातन काल में पट कपड़े को कहते थे।

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अब कला लुप्त हो रही
फड़ बांचने की कला समय के साथ अपना वैभव खो रही है। इसे बांचने वाले कलाकार भी कम बचे हैं। शेखावाटी में पाबूजी की फड़ बांचने की परंपरा समृद्ध है। कपड़े पर फड़ मूल भावना देव स्तुति है। जिसमें राजस्थान के लोकदेवता बाबा रामदेव, पाबूजी राठौड़, जाहरवीर गोगाजी, देवनारायण आदि प्रमुख हैं। इसके अलावा कृष्ण लीलाओं सहित दुर्गा व श्रीराम की स्तुति भी की जाती है। संगमानंद बताते हैं कि फड़ बांचने का सिलसिला करीब सात सौ वर्षों से जनमानस के मन में रचा- बसा है। चमकतेे लाल, पीले, नीले, हरे,सुनहरी व काले रंगों से कपड़े पर बने चित्रों की छटा लुभावनी होती है। फड़ कथानक चित्र, गीत -संगीत एवं कला-साहित्य की अनूठी संस्कृति है।

भीलवाड़ा के शाहपुरा से हुई आरंभ
फड़ बांचने की कला भीलवाड़ा जिले के शाहपुरा से जन्मी है। ऐसा माना जाता है कि शाहपुरा के छीपा चित्रकारों ने फड़ चित्रण के लिए मेवाड़ शैली के तहत एक अनूठी चित्रण शैली फड़ के तौर पर विकसित की। फड़ बांचने के समय लोक गायकी के साथ लोकवाद्यों रावणहत्था, हारमोनियम, डेरू, ढोल व मंजीरों के अलावा सारंगी का प्रयोग होता है। भोपा जाति के गायक व महिलाएं घूंघट की ओट में तीखे स्वरों में रात्रि में फड़ बांचते हैं। भजनों की गंगा में श्रद्धालु रातभर गोते लगाते हैं।

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प्रदेश में सबसे पहले ऊंट लाए पाबूजी
भगवान देवनारायण को प्रदेश में लोक देवता के तौर पर पूजा जाता है। इन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। इनकी लोक स्तुति की फड़ सबसे लंबी होती है। लम्बाई 20 हाथ से 25 हाथ तक होती है। इसमें देवनारायण की कथा का चित्रांकन किया जाता है। फड़ की प्रस्तुति एक रात्रि में पूरी नहीं होती है। पाबूजी की फड़ की लंबाई 15 से 20 हाथ तक होती है। इसमें मारवाढ़ के कोलू गांव में जन्मे पाबूजी की जीवनगाथा को चित्रित किया जाता है। लोक कथाओं में बताया गया है कि राजस्थान में सबसे पहले ऊंट पाबूजी राठौड़ पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लंकेरू इलाके से लाए थे।