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एक ऐसा गांव जहां 400 साल से घोड़ी पर नहीं बैठता है दूल्हा, जानिए पूरा मामला

400 सालों से कोई भी दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता है। कई पीढ़ी बीत चुकी। मगर राजस्थान के इस गांव में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक ने किसी भी दूल्हे को घोड़ी पर बैठे हुए नहीं देखा है।

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चूरू

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Santosh Trivedi

Nov 28, 2023

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सरदारशहर. पुलासर गांव में दुल्हन के साथ चलता दूल्हा।

चूरू/सरदारशहर। शादियों का सीजन शुरू हो चुका है। बैंड, बाजा और बारात के जश्न हर तरफ दिख रहे हैं। मगर, उपखंड मुख्यालय से 9 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद गांव पूलासर। जहां बीते 400 सालों से कोई भी दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता है। कई पीढ़ी बीत चुकी। मगर, इस गांव में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक ने किसी भी दूल्हे को घोड़ी पर बैठे हुए नहीं देखा है।


हालांकि विवाह के मौके पर दूल्हा दुल्हन शादी की सभी रस्मों को निभाते हैं। घर में मेहमानों के लिए लजीज पकवान बनते हैं। नाच गाने होते हैं। घर में हर तरफ खुशियों का माहौल होता है। बारात भी निकलती है। लेकिन दूल्हे के लिए घोड़ी नहीं होती। दूल्हा बारात में पैदल ही चलता है।


आज भी निभा रहे पुरखों की ये परंपरा
इस परंपरा को लेकर ग्रामीणों ने बताया कि उनके पुरखों की ये परंपरा वे 400 सालों से निभा रहे हैं। उनके दादा परदादा भी घोड़ी पर नहीं बैठे थे, और वे भी घोड़ी पर नहीं बैठे थे। दरअसल, यह परंपरा गांव में बने लोक देवता दादोजी महाराज से जुड़ी हुई है। इसी के चलते गांव में शादी के समय दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता हैं। यह परंपरा आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी है।


उगाराम के सम्मान में नहीं बैठते घोड़ी पर
गांव के संजय पारीक ने बताया कि करीब 400 साल पहले उगाराम नाम के जाबांज थे। उन्हीं से गांव में दूल्हे को घोड़ी पर नहीं बैठने की परंपरा जुडी हुई है। गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि पूलासर गांव पहले स्वतंत्र गांव था। लेकिन बीकानेर के तत्कालीन राजा ने पूलासर गांव से लगान मांगा। इस पर ग्रामीणों ने लगान देने से मना कर दिया कि यह पूरा गांव ब्राह्मणों का है और ब्राह्मण पूजा पाठ करके अपना जीवन यापन करते हैं।


लेकिन राजा नहीं माने और बीकानेर से अपनी सेना लेकर गांव पर चढ़ाई कर दी। इस पर उगाराम ने घोड़ी पर बैठ कर राजा के सामने चला गया। सवाई छोटी गांव में राजा का उगाराम का आमना सामना हो गया। राजा से उगाराम ने आग्रह किया कि गांव से लगान ना लें। फिर भी राजा नहीं माने और अंत में उगाराम ने अपना शीश काटकर थाली में राजा को लगान के रूप में दे दिया । तभी से ग्रामीणों की वीर उगाराम के प्रति आस्था बन गई । इसके बाद से ही ग्रामीण उनके सम्मान में घोड़ी पर नहीं बैठते।


चरण पादुकाओं की होती है पूजा

गांव के बुजुर्गों के मुताबिक करीब 679 साल पहले गांव को पुलाराम सहारण ने बसाया था। आबादी व क्षेत्रफल की दृष्टि से गांव बड़ा है और ज्यादातर परिवार व्यापार करते हैं । गांव में आधी से अधिक आबादी ब्राह्मण समाज की है। गांव में अनेकों देवी देवताओं के मंदिर हैं। खास बात ये है इनमें कोई मूर्ति या फोटों नही है। यहां के लोग दादोजी महाराज की चरण पादुकाओं को पूजते है, जो इस मन्दिर में स्थित है।

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