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Churu Heritage : चूरू का अनोखा इतिहास : ऊंट-घोड़े नहीं, बकरों से खिंचती थी बग्घी

शहर के बुजुर्गों की जुबान पर इस अनोखी “बकराबग्घी” का जिक्र जरूर आ जाता है। यह केवल एक सवारी नहीं थी, बल्कि पुराने चूरू की संस्कृति, रईसी और अनूठी परंपराओं की जीवंत पहचान थी।

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Churu Bakra baggi

नरेन्द्र शर्मा

चूरू़. एक वह भी दौर था जब वर्तमान जैसे वाहन नहीं हुआ करते थे, तांगा, बैल, ऊंट गाड़ी हुआ करती थी लेकिन चूरू हमेशा से ही कर्मवीरों की भूमि रही है। छोटी काशी चूरू नवाचार का केन्द्र रहा है वह भी उस जमाने में हुआ करते थे जब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। उसी दौर में चूरू में इजाद हुई बकरा गाड़ी, जिसे बकरा बग्घी भी कहा जाता है।

सड़कें नहीं हुआ करती थी फिर भी बालूरेत पसरी गलियों में जब यह बकरा बग्घी चलती जो देखने वालों का हजूम उमड़ जाया करता था। पुराने दौर में बकरों की ओर से खींची जाने वाली यह खास बग्घी शहर की शान मानी जाती थी जो आज भी नगरश्री में आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है।

किसी शाही सवारी से कम नहीं थी बग्घी
नगर श्री (Churu Nagar Shri) के रामगोपाल बहड़ ने बताया कि चूरू के सामरमल मंत्री परिवार के यहां यह अनोखी बकरा बग्घी (Goat Carriage) हुआ करती थी। जिस दौर में लोग घोड़ों और ऊंटों की सवारी को शाही ठाठ मानते थे, उस समय बकरों से सजाई गई बग्घी शहर में न केवल चर्चा का विषय बनी रहती बल्कि यह भी किसी शाही सवारी से कम नहीं मानी जाती थी। बहड़ बताते है, बकरे के गले में घंटी और गाड़ी में लगे मजीरों की खनक उस समय गूंज उठती थी जब सेठ परिवार के बच्चे सैर करने निकलते थे। बकरा बग्घी (Bakra Baggi) शहर की गलियों और बाजारों से गुजरती थी तो लोग अपने घरों और दुकानों से बाहर निकलकर इसे देखने लगते थे। बच्चे इसके पीछे-पीछे दौड़ते थे और बुजुर्ग भी इस अनोखी सवारी को बड़े गौर से निहारा करते थे।

देखने लायक होती थी सजावट
नगर श्री के सिचव श्यामसुन्दर शर्मा ने बताया कि बकरों को विशेष रूप से तैयार किया जाता था। उनके गले में घंटियाँ, रंगीन कपड़े और आकर्षक सजावट की जाती थी। वहीं बग्घी को भी खूबसूरत नक्काशी और डिजाइन से सजाया जाता था। दूर से ही इसकी आवाज और सजावट लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती थी। उस दौर में यह केवल सवारी का साधन नहीं, बल्कि परिवार की शान और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। शहर में आने वाले मेहमानों को भी इस अनोखी बग्घी के बारे में बताया जाता था। कई लोग तो केवल इसे देखने के लिए ही मंत्री परिवार के निवास के आसपास पहुंच जाते थे।

इतिहास ही नहीं शोध का विषय
सुनील कुमार भाउवाला का कहना है कि चूरू (Churu) की यह बकरा बग्घी अपने समय में पूरे इलाके में मशहूर थी। आसपास के गांवों तक इसके चर्चे होते थे। धीरे-धीरे समय बदला, आधुनिक वाहनों का दौर आया और यह परंपरा इतिहास के पन्नों में सिमटती चली गई जो वर्तमान के लिए एक शोध का विषय है।

देखने आते हैं लोग
आज भले ही बकरा ईद (Eid al-Adha) जैसे अवसर पर जब बकरों की बात होती है लेकिन नगर श्री में रखी बकरा गाड़ी लोग देखने आते हैं। शहर के बुजुर्गों की जुबान पर इस अनोखी “बकराबग्घी” का जिक्र जरूर आ जाता है। यह केवल एक सवारी नहीं थी, बल्कि पुराने चूरू की संस्कृति, रईसी और अनूठी परंपराओं की जीवंत पहचान थी।