
सूर्यकुमार यादव, देवजीत सैकिया और अजीत अगरकर (फोटो- IANS)
CIC Clarification on BCCI: सोमवार को केंद्रीय सूचना आयोग (Central Information Commission) ने बड़ा फैसला सुनाया, जिससे साफ हो गया कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट से बाहर है। मतलब ये है कि अगर RTI लगाकर BCCI के बारे में आप किसी भी तरह की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वो आपको नहीं मिल पाएगी। आयोग ने कहा कि यह क्रिकेट संस्था न तो कानून द्वारा स्थापित है और न ही इसे सरकार से कोई खास आर्थिक मदद मिलती है। BCCI पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।
सूचना आयुक्त पीआर रमेश ने गीता रानी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। गीता रानी ने अपनी अपील में बीसीसीआई के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का प्रतिनिधित्व करने और राष्ट्रीय टीम के लिए खिलाड़ियों का चयन करने के अधिकार के बारे में जानकारी मांगी थी। आयुक्त ने अपने फैसले में कहा कि बीसीसीआई के मामले में आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) के तहत जरूरी वैधानिक शर्तें पूरी नहीं होती हैं।
सीआईसी ने सोमवार को जारी अपने आदेश में कहा, "आरटीआई एक्ट की धारा 2(H) के अर्थ के अनुसार बीसीसीआई को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। इसलिए, मौजूदा मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, इस एक्ट के प्रावधान बीसीसीआई पर लागू नहीं होते हैं।"
सूचना के क्षेत्र में सर्वोच्च संस्था सीआईसी एक ऐसी अपील पर सुनवाई कर रही थी, जो साल 2017 में केंद्रीय युवा मामले और खेल मंत्रालय के समक्ष दायर एक आरटीआई आवेदन से जुड़ी थी। इस आवेदन में उन प्रावधानों के बारे में जानकारी मांगी गई थी, जिनके तहत बीसीसीआई भारत का प्रतिनिधित्व करता है, सरकार द्वारा उसे दिए जाने वाले लाभ, और इस क्रिकेट संस्था पर सरकार का किस हद तक नियंत्रण है।
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा था कि मांगी गई जानकारी उसके पास उपलब्ध नहीं है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि आरटीआई आवेदन को बीसीसीआई को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता, क्योंकि आरटीआई एक्ट के तहत बीसीसीआई को 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया गया है।
सीआईसी के समक्ष सुनवाई के दौरान, बीसीसीआई ने यह तर्क दिया कि वह तमिलनाडु सोसायटी पंजीकरण एक्ट के तहत पंजीकृत एक निजी स्वायत्त संस्था है। बीसीसीआई ने कहा कि वह आरटीआई एक्ट की धारा 2(एच) के तहत जरूरी स्वामित्व, नियंत्रण या पर्याप्त वित्तीय सहायता से जुड़े मानदंडों को पूरा नहीं करता है। आयोग ने अपने फैसले में कहा, "पंजीकरण केवल एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से निजी व्यक्तियों द्वारा गठित किसी संस्था को कानूनी मान्यता प्रदान की जाती है। इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि उस संस्था का अस्तित्व किसी कानून के माध्यम से ही सामने आया है।"
आयोग ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित होता हो कि बीसीसीआई को सरकार से किसी भी प्रकार की पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त होती है। सीआईसी ने दर्ज किया कि बीसीसीआई मीडिया राइट्स, स्पॉन्सरशिप, ब्रॉडकास्टिंग एग्रीमेंट और टिकटों की बिक्री के जरिए स्वतंत्र रूप से रेवेन्यू कमाता है, और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। आदेश में कहा गया, "बीसीसीआई किसी भी सरकारी फंडिंग से स्वतंत्र होकर काम करता है। इसका रेवेन्यू पूरी तरह से इसकी अपनी गतिविधियों से आता है।"
इसके अलावा, बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का जिक्र करते हुए, जिसमें शीर्ष अदालत ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों के जरिए क्रिकेट संस्था में शासन सुधार लागू किए थे, सीआईसी ने कहा कि, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि बीसीसीआई ऐसे काम करता है जिनका स्वरूप सार्वजनिक है, लेकिन उसने इस संस्था को आरटीआई एक्ट के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' घोषित नहीं किया था।
अपील को खारिज करते हुए, सीआईसी ने कहा कि यह साबित करने का जिम्मा कि बीसीसीआई का स्वामित्व, नियंत्रण या उसे काफी हद तक सरकार द्वारा वित्तपोषित किया जाता है, अपीलकर्ता द्वारा पूरा नहीं किया गया है। आदेश में कहा गया, "ऊपर बताई गई तथ्यात्मक और कानूनी स्थिति को देखते हुए, आयोग प्रतिवादियों द्वारा पेश की गई दलीलों को सही मानता है। तदानुसार, यह अपील खारिज की जाती है।"
Published on:
19 May 2026 09:20 am
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