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2011 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद एमएस धोनी कैसे ‘हीरो’ से बने ‘विलेन’, इन फैसलों से शुरू हुआ नफरत और गुस्से का दौर

सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, जहीर खान, गौतम गंभीर, हरभजन सिंह, युवराज सिंह ये सब 2011 के बाद कोई विश्व कप नहीं खेल पाए। सचिन की बात अलग थी, उम्र का तकाजा था। लेकिन बाकी खिलाड़ियों को तो यह भी नहीं पता था कि 2011 उनका आखिरी विश्व कप बन जाएगा।

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भारत

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Siddharth Rai

Apr 02, 2026

टीम इंडिया के मुख्य कोच गौतम गंभीर और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी (Photo IANS)

How Dhoni became a hated figure: आज से ठीक 15 साल पहले की बात है। मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में महेंद्र सिंह धोनी ने श्रीलंका के खिलाफ फाइनल में वो ऐतिहासिक छक्का जड़ा था और भारत दूसरी बार वनडे वर्ल्ड कप जीत गया। यकीन नहीं होता कि इतना वक्त गुजर गया। उस रात की यादें आज भी दिल को गर्म कर देती हैं। लेकिन उस जीत के बाद जो हुआ, वो सिर्फ खुशियों की कहानी नहीं थी। उस जीत की छाया में भारतीय क्रिकेट के कुछ सबसे बड़े नामों का करियर धीरे-धीरे खत्म होने लगा, और इस बात ने सालों तक भारतीय क्रिकेट में कड़वाहट भर दी।

वो खिलाड़ी जिन्हें दूसरा मौका नहीं मिला

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, जहीर खान, गौतम गंभीर, हरभजन सिंह, युवराज सिंह ये सब 2011 के बाद कोई विश्व कप नहीं खेल पाए। सचिन की बात अलग थी, उम्र का तकाजा था। लेकिन बाकी खिलाड़ियों को तो यह भी नहीं पता था कि 2011 उनका आखिरी विश्व कप बन जाएगा। दो साल बाद जब भारत ने इंग्लैंड में चैंपियंस ट्रॉफी जीती, जो छह साल में तीसरी आईसीसी ट्रॉफी अपने नाम की, तब 2011 के फाइनल की प्लेइंग 11 में से सिर्फ तीन खिलाड़ी इस टीम का हिस्सा थे। वह विराट कोहली, सुरेश रैना और धोनी खुद थे। इतने बड़े-बड़े खिलाड़ियों को इस तरह बाहर का रास्ता दिखाया गया, इसने भारतीय क्रिकेट में नफरत और गुस्से का एक लंबा दौर शुरू किया।

गंभीर का दर्द सबसे गहरा

इन सभी खिलाड़ियों ने कभी न कभी धोनी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। लेकिन गौतम गंभीर, जो आज भारत के हेड कोच हैं और अपनी कोचिंग में दो आईसीसी ट्रॉफी जीत चुके हैं, सबसे ज्यादा मुखर रहे। 2011 के फाइनल में जब सहवाग और सचिन जल्दी आउट हो गए थे, तब लग रहा था कि भारत हार जाएगा। उस दबाव में गंभीर ने 97 रन की जो पारी खेली, वो उस मैच की सबसे निर्णायक पारी थी। विराट कोहली के साथ तीसरे विकेट के लिए 83 रनों की साझेदारी ने भारत को वापस मैच में लाया। लेकिन मैन ऑफ द मैच का अवॉर्ड धोनी को मिला। टीम से नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद हरभजन और सहवाग ने कई बार कहा कि उन्हें बताया गया कि टीम आगे बढ़ रही है और अब युवाओं को मौका देना चाहती है, जबकि उन्हें लगता था कि उनमें अभी काफी क्रिकेट बाकी है।

श्रीनिवासन का पक्षपात

सच्चाई यह है कि इस दौर में धोनी बेहद ताकतवर थे। इसकी बड़ी वजह थी एन श्रीनिवासन का भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) का अध्यक्ष बनना। श्रीनिवासन इंडिया सीमेंट्स के मालिक हैं जो इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) में चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) की मालिक भी है, और धोनी आज भी उस टीम का हिस्सा हैं। यकीन होता है? श्रीनिवासन ने खुद कहा था कि उन्होंने एक बार कड़े विरोध के बावजूद धोनी की कप्तानी बचाई थी। तो अगर धोनी से नफरत थी, तो उसकी वजहें पक्की और ठोस थीं।

वक्त ने भर दिए जख्म

2013 के बाद भारत को अपनी अगली आईसीसी ट्रॉफी जीतने में पूरे 11 साल लग गए। आखिरकार 2024 में रोहित शर्मा की कप्तानी में भारतीय टीम ने टी20 विश्व कप का खिताब जीतकर उस सूखे को खत्म किया। लेकिन इस पूरे अंतराल में महेंद्र सिंह धोनी लंबे समय तक टीम के कप्तान रहे, फिर भी भारत किसी भी आईसीसी टूर्नामेंट के फाइनल तक नहीं पहुँच सका। हाल ही में टी20 विश्व कप जीत के बाद जब गौतम गंभीर और महेंद्र सिंह धोनी ने सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को बधाई दी, तो वो पल देखकर दिल भर आया। सालों पुरानी कड़वाहटें पिघलती नजर आईं। फिर भी, आज जैसे मौके पर जब 15 साल पुराना वो यादगार छक्का याद आता है, तो साथ ही यह भी याद हो आता है कि उस जीत के बाद भारतीय क्रिकेट में क्या-क्या बदला। वो दौर आज के दौर जैसा बिल्कुल नहीं था।