
Project Cheetah MP India: Photo AI
Project Cheetah: भारत में चीते की वापसी को वन्यजीव संरक्षण की बड़ी उपलब्धि माना गया। सितंबर 2022 में शुरू हुए प्रोजेक्ट चीता के तहत अफ्रीका से लाए गए चीतों ने कूनो में न केवल नई पीढ़ी को जन्म दिया, बल्कि भारत में इस प्रजाति की आबादी दोबारा बसने की उम्मीद भी जगाई। लेकिन इस सफलता के साथ एक मुश्किल चुनौती भी सामने आई है।
चीते जंगल की सीमाओं से बाहर निकलकर गांवों और दूसरे वन क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में ग्रामीणों की सुरक्षा और चीतों की निगरानी, दोनों जरूरी हो गए हैं। हाल ही में 19 महीने के चीते KNG22 की गोली लगने से हुई मौत ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। सवाल है कि जब रेडियो कॉलर से चीतों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, तब एक शावक को गोली कैसे लगी? क्या कूनो की सुरक्षा व्यवस्था जंगल के बाहर कमजोर पड़ रही है?
कूनो के चीते कई बार मध्य प्रदेश की सीमा पार कर राजस्थान के इलाकों तक पहुंच चुके हैं। मार्च 2026 में KP-2 और KP-3 नाम के दो चीते राजस्थान के बारां जिले में देखे गए। दोनों कूनो से करीब 60 से 70 किलोमीटर दूर तक पहुंच गए थे। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने उस समय उनके इस आवागमन को चीतों का स्वाभाविक क्षेत्रीय व्यवहार बताया था। दोनों राज्यों की वन टीमें GPS और रेडियो कॉलर की मदद से 24 घंटे उनकी निगरानी कर रही थीं।
KP-2 करीब 55 दिन तक राजस्थान के बारां और कोटा क्षेत्र में घूमता रहा। इस दौरान उसके पशुओं का शिकार करने की खबरें भी आईं। ग्रामीणों के बीच संभावित मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका को देखते हुए 27 मार्च को उसे बेहोश कर वापस कूनो लाया गया।
मई में भी कूनो से निकले चीते को राजस्थान के झालावाड़ क्षेत्र में बेहोश कर वापस लाने की खबर सामने आई। 6 मई की एक रिपोर्ट में इस चीते की पहचान KAP-13 बताई गई, जबकि 7 मई की रिपोर्ट में KP-3 के राजस्थान-मध्य प्रदेश सीमा के पास पकड़े जाने की जानकारी है। इन दोनों घटनाओं की पहचान को एक ही घटना मानने से पहले वन विभाग के रिकॉर्ड से पुष्टि जरूरी है।
यहां समझने वाली बात है कि चीते का जंगल से बाहर निकलना हमेशा किसी सुरक्षा चूक का संकेत नहीं होता। चीतों का लंबी दूरी तक घूमना और अपना क्षेत्र तलाशना स्वाभाविक व्यवहार है। NTCA ने भी मार्च में अंतरराज्यीय चीता कॉरिडोर की जरूरत पर जोर दिया था। चुनौती यह है कि उनके रास्ते में गांव, खेत और पशुओं के बाड़े आने पर टकराव न हो।
27 अक्टूबर 2026 को 19 महीने के नर चीते KNG22 की इलाज के दौरान मौत हो गई। यह शावक मादा चीता निर्वा की संतान था। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की 28 अक्टूबर की आधिकारिक विज्ञप्ति में बताया गया कि, KNG22 को 25 अक्टूबर को कूनो के संरक्षित क्षेत्र से बाहर मुरैना के प्रादेशिक वन क्षेत्र में घायल अवस्था में पाया गया था। उसे उसी दिन श्योपुर प्रादेशिक वन मंडल की टीम ने बचाया और इलाज के लिए जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय भेजा गया।
जांच और उपचार के दौरान एक्स-रे तथा सीटी स्कैन किए गए। आपातकालीन सर्जरी में उसके शरीर से पांच फायरआर्म पैलेट्स यानी बंदूक से निकले धातु के छर्रे निकाले गए। शरीर के अंदरूनी अंगों, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा था। तमाम कोशिशों के बावजूद 27 अक्टूबर को उसकी मौत हो गई।
यह प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में किसी चीते की गोली लगने से हुई पहली दर्ज मौत बताई जा रही है। हालांकि, गोली किसने चलाई और इसके पीछे शिकार की कोशिश थी या कोई दूसरी वजह, इसका अंतिम जवाब जांच के बाद ही मिलेगा।
घटना की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 28 अक्टूबर को उच्चस्तरीय टीम भेजने की घोषणा की। इसमें NTCA के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट्स और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) के दो वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। टीम को घटना के कारणों, उपलब्ध सबूतों और सुरक्षा व निगरानी व्यवस्था की जांच करनी है। मध्य प्रदेश सरकार ने भी वन और पुलिस अधिकारियों को शामिल करते हुए विशेष जांच दल (STF) बनाया है।
29 अक्टूबर को एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि, जांच से जुड़े सूत्रों ने पारंपरिक भरमार बंदूक के इस्तेमाल की आशंका जताई है। रिपोर्ट में मुरैना क्षेत्र में निगरानी की कमियों की बात भी कही गई है। हालांकि, इसे जांच का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। अभी यह पता लगाना बाकी है कि गोली किसने चलाई, किस परिस्थिति में चलाई गई और क्या यह जानबूझकर किया गया हमला था।
KNG22 की मौत के बाद निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या को केवल कूनो की चारदीवारी या रेडियो कॉलर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। चीते जब संरक्षित क्षेत्र से बाहर दूसरे वन मंडलों में पहुंचते हैं, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कई स्थानीय वन इकाइयों और राज्यों के बीच बंट जाती है।
रेडियो कॉलर से जानवर की लोकेशन का पता चल सकता है, लेकिन हर समय उसके आसपास सुरक्षा बल मौजूद हों, यह अलग चुनौती है। इसके लिए स्थानीय वनकर्मियों की सतर्कता, समय पर सूचना, पुलिस और वन विभाग के बीच तालमेल के साथ ही गांवों में लोगों का सहयोग जरूरी है।
यदि किसी क्षेत्र में अवैध शिकार या हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो वहां वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए स्थानीय स्तर पर खुफिया जानकारी और निगरानी भी मजबूत करनी होगी। इसलिए KNG22 की मौत को केवल एक शावक की मौत नहीं, बल्कि संरक्षित क्षेत्र से बाहर वन्यजीवों की सुरक्षा की परीक्षा के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।
प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत 17 सितंबर 2022 को हुई थी। अब तक नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और बोत्सवाना से चीते भारत लाए जा चुके हैं। इस बीच भारत में जन्मी मादा चीताओं ने भी शावकों को जन्म दिया है। 5 अक्टूबर 2026 को भारतीय मूल की मादा KJP21 ने पांच शावकों को जन्म दिया था।
उस समय देश में चीतों की संख्या 60 हो गई थी। इसके बाद मौतों के कारण संख्या में बदलाव आया। 27 अक्टूबर को KNG22 की मौत के बाद मध्य प्रदेश वन विभाग के हवाले से आई रिपोर्टों में देश में कुल 58 चीते बताए गए। इनमें 52 कूनो, चार गांधीसागर और दो वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में मौजूद हैं।
इस बीच 25 अक्टूबर को प्रोजेक्ट चीता के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि कूनो आत्मनिर्भर चीता आबादी विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनका आकलन था कि मौजूदा रफ्तार बनी रही तो 2027 के अंत तक कूनो में चीतों की संख्या 80 के करीब पहुंच सकती है।
महत्वपूर्ण पड़ताल- भोपाल के वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे लंबे समय से कूनो में चीता परियोजना के प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाते रहे हैं। एक मीडिया रिपोर्ट में 27 सितंबर 2024 को अजय दूबे की ओर से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को भेजे गए पत्र का जिक्र किया था।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने आरोप लगाया था कि चीतों को जरूरत से ज्यादा बेहोश किया गया। उन्होंने दावा किया था कि चीतों को 110 बार ट्रैंक्विलाइज किया गया और इसके लिए जरूरी अनुमति तथा रिकॉर्ड की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। उन्होंने चीते पवन की मौत, पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी और स्वास्थ्य निगरानी से जुड़े प्रोटोकॉल पर भी सवाल उठाए थे।
KNG22 की गोली लगने से मौत के बाद अजय दुबे ने एक बार फिर परियोजना के प्रबंधन और जवाबदेही का सवाल उठाया है। दुबे ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार को इस मामले की CBI जांच शुरू कराने का निर्देश देने की मांग की है।
उनका तर्क है कि केवल उच्चस्तरीय सरकारी जांच पर्याप्त नहीं होगी और घटना की स्वतंत्र जांच जरूरी है। इस मांग के बीच केंद्र सरकार ने पहले ही NTCA और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) के अधिकारियों की उच्चस्तरीय टीम गठित की है। मध्य प्रदेश सरकार की STF भी मामले की जांच कर रही है।
यह सवाल प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत से ही संरक्षण विशेषज्ञों के बीच चर्चा में रहा है। वन्यजीव जीवविज्ञानी और संरक्षण विशेषज्ञ रवि चेल्लम भी मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में पहले ही कह चुके हैं कि चीते लंबी दूरी तक घूमने वाले जानवर हैं और कूनो का क्षेत्र उनके स्वतंत्र रूप से रहने वाली आबादी के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
यहां जानिए उन्होंने क्या कहा था-
“Kuno is too small in size to establish a wild population of a wide-ranging species like the cheetah.”
इसका मतलब यह नहीं कि कूनो में चीते नहीं रह सकते, बल्कि यह कि उनकी आबादी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए आसपास के उपयुक्त प्राकृतिक क्षेत्रों और उनके बीच सुरक्षित आवाजाही की योजना भी जरूरी है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है कि, कूनो राष्ट्रीय उद्यान का क्षेत्रफल लगभग 748 वर्ग किलोमीटर है। लेकिन किसी वन्यजीव के लिए आवास की पर्याप्तता सिर्फ क्षेत्रफल से तय नहीं होती। शिकार की उपलब्धता, पानी, वनस्पति, दूसरे जानवरों की मौजूदगी और मानव बस्तियों से दूरी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
चीतों को एक ही संरक्षित क्षेत्र में सीमित रखना उनकी प्राकृतिक गतिविधियों के अनुकूल नहीं हो सकता। वे साथी, भोजन और अपना क्षेत्र तलाशने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। इसलिए कूनो, गांधीसागर और राजस्थान के संभावित संरक्षण क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक आवागमन के रास्ते विकसित करने की योजना पर चर्चा होती रही है।
एक मीडिया रिपोर्ट में, कूनो, गांधीसागर और राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स को जोड़ने वाले बड़े चीता कॉरिडोर की योजना की चुनौतियों पर चर्चा की थी। लेख में सवाल उठाया गया था कि क्या इन क्षेत्रों के बीच लगातार जुड़ा हुआ वन क्षेत्र और पर्याप्त शिकार उपलब्ध है? साथ ही, इतने बड़े क्षेत्र में चीतों को खोजने, उनकी निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर बचाव दल पहुंचाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और संसाधनों की उपलब्धता भी चुनौती होगी।
इससे एक अहम बात निकलती है, कॉरिडोर सिर्फ नक्शे पर वन क्षेत्रों को जोड़ने का नाम नहीं है। उसमें चीतों के लिए भोजन, सुरक्षित आवागमन और स्थानीय लोगों के साथ टकराव रोकने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
चीते जंगल से बाहर न निकलें, इसके लिए पूरे संरक्षित क्षेत्र की बाड़बंदी का विचार भी संरक्षण बहस का हिस्सा रहा है। 2024 में भी फेंसिंग को एक संभावित विकल्प के रूप में रखा गया था। इसके पक्ष में तर्क है कि इससे वन्यजीवों और ग्रामीणों के बीच सीधा टकराव कम हो सकता है और संरक्षित क्षेत्र के भीतर चीतों की सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। बाड़बंदी से वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही प्रभावित हो सकती है। दूसरे जानवरों के आवागमन, उनके आवास और वन क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए फेंसिंग को पूरी समस्या का आसान समाधान मानना ठीक नहीं होगा।
असली सवाल यह है कि क्या कूनो के आसपास की परिस्थितियों में बाड़बंदी व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से उचित होगी? इसका जवाब क्षेत्र की बनावट, वन्यजीवों की आवाजाही और स्थानीय समुदायों की जरूरतों का अध्ययन करने के बाद ही मिल सकता है।
KNG22 को कूनो के मुख्य संरक्षित क्षेत्र के बाहर श्योपुर के प्रादेशिक वन क्षेत्र में घायल पाया गया था। यह तथ्य एक प्रशासनिक चुनौती की ओर इशारा करता है। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर निगरानी और सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां के प्रबंधन की होती है, लेकिन चीता जब दूसरे प्रादेशिक वन मंडल में पहुंचता है तो वहां की वन इकाई की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
जानकारी यह भी मिली है कि KNG22 कूनो की सीमा से करीब 100 किलोमीटर दूर मिला था। यह भी सामने आया कि वह रेडियो कॉलर से लैस था। इसका अर्थ है कि लोकेशन का पता लगाने वाली तकनीक मौजूद होने के बावजूद उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अलग चुनौती है।
रेडियो कॉलर यह बता सकता है कि जानवर कहां है, लेकिन वह उसे गोली, फंदे, सड़क दुर्घटना या मानव-वन्यजीव संघर्ष से अपने आप नहीं बचा सकता। इसके लिए स्थानीय वनकर्मियों की सक्रियता, त्वरित प्रतिक्रिया, पुलिस से तालमेल और आसपास के गांवों से सूचना मिलना जरूरी है।
कूनो और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए चीता केवल वन्यजीव नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा सवाल भी है। यदि कोई चीता गांव के पास पहुंचता है या पालतू पशु का शिकार करता है, तो ग्रामीणों में डर और नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक है।
ऐसे में चीता मित्रों की भूमिका अहम हो सकती है। वे ग्रामीणों को चीते की मौजूदगी की सूचना देने, सुरक्षित दूरी बनाए रखने और वन विभाग तक समय पर जानकारी पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन यह व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब उन्हें नियमित प्रशिक्षण, संसाधन और विभाग से सहयोग मिले।
इसके साथ पशुधन के नुकसान पर मुआवजे की प्रक्रिया सरल और समयबद्ध होनी चाहिए। स्थानीय लोगों को पर्यटन और संरक्षण से रोजगार के अवसर भी मिलने चाहिए। यदि ग्रामीणों को लगेगा कि परियोजना से उनकी सुरक्षा और आजीविका प्रभावित हो रही है, तो उनके सहयोग की उम्मीद करना मुश्किल होगा।
इसलिए प्रोजेक्ट चीता की सफलता का एक पैमाना यह भी होना चाहिए कि कूनो के आसपास रहने वाले लोगों को इस परियोजना से कितना भरोसा और लाभ मिल रहा है।
अब सबसे जरूरी है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर किया जाए। कूनो और आसपास के वन क्षेत्रों में निगरानी का साझा तंत्र मजबूत करना होगा। रेडियो कॉलर से मिलने वाली सूचना पर स्थानीय टीम कितनी जल्दी मौके पर पहुंचती है, इसकी समीक्षा जरूरी है। राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच प्रस्तावित वन्यजीव कॉरिडोर को भी इस नजरिये से विकसित करना होगा कि चीतों की प्राकृतिक आवाजाही बनी रहे और गांवों में टकराव की आशंका कम हो।
स्थानीय लोगों को चीता मित्रों के माध्यम से निगरानी और सूचना तंत्र से जोड़ना, पशुधन के नुकसान पर समय पर सहायता देना और अवैध शिकार रोकने के लिए पुलिस-वन विभाग का तालमेल बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
प्रोजेक्ट चीता की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि भारत में कितने चीते जन्मे या उनकी संख्या कितनी बढ़ी। असली कसौटी यह है कि क्या वे सुरक्षित रह सकते हैं, क्या उनके लिए पर्याप्त जुड़ा हुआ प्राकृतिक आवास है और क्या स्थानीय लोग उनके साथ सुरक्षित तरीके से रह सकते हैं। KNG22 की मौत ने इसी कसौटी पर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है।
Updated on:
30 Oct 2026, 4:31 PM IST
Published on:
30 Oct 2026, 4:31 PM IST
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