
दमोह के स्वतंत्रता संग्राम सैनानी सिंघई रघुवर प्रसाद की कुछ निशानिया
दमोह. इस वर्ष 15 अगस्त से देश की आजादी का अस्सी वां साल शुरू होने जा रहा है। देश की आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अनेकों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साथ अनेक ऐसे गुमनाम सेनानी भी रहे हैं] जिन्होंने अपने जीते जी अंग्रेजों को चैन की सांस नहीं लेने दी। लेकिन देश के आजाद होने के पहले ही अंग्रेजों की कुटिल चाल के शिकार होकर प्राण गवा बैठने की वजह से इनका नाम लेने वाला कोई नहीं बचा शायद यही वजह रही की आजादी के बाद लिखे गए स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी इनको कहीं जगह नहीं मिली .
दमोह जिले के ऐसे ही एक गुमनाम सैनानी सिंघई रघुवर प्रसाद का नाम आज भी बुजुर्ग लोग शान से लेते इनकी शौर्य गाथा सुनाते नजर आते हैं। जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर जुझार गांव में चौधरी दौलत राम के पुत्र सिंघई हजारीलाल के यहां 30 नवंबर 1886 को सिंघई रघुवर प्रसाद का जन्म हुआ था। बचपन से ही घुड़सवारी के साथ बंदूक का शौक रखने वाले रघुवर प्रसाद ने युवावस्था से ही अंग्रेजों की नाक में दम करना शुरू कर दी थी।
अन्याय अत्याचार के खिलाफ हमेशा अपने लाल घोड़े चाबुक व दुनाली बंदूक के साथ तत्पर रहने वाले रघुवर प्रसाद के पारिवारिक सामाजिक धार्मिक प्रभाव के चलते अंग्रेजों ने उनकों अनेक महत्वपूर्ण पद देकर अपने रंग में ढालने की कोशिश भी की। लेकिन वह सफल नहीं हो सके। वहीं उनके विभिन्न धार्मिक सेवा भावी कार्यों के शिलालेख आज भी उनकी पद प्रतिष्ठा की स्मृति को तरो ताज़ा रखे हुए है। 1920 के दशक में जब हैजा चेचक माता जैसी महामारी फैली और इलाज के अभाव में लोगों की जान जाने लगी तो सिंघई रघुवर प्रसाद ने अपनी धन संपदा के साथ पावर का उपयोग करते हुए सिविल अस्पताल निर्माण का बीड़ा उठाते हुए 1924 में दो मेडिकल वार्डो का निर्माण कराकर निशुल्क दवा और उपचार शुरू कराकर लाल चेचिस माता जैसी महामारी से पीड़ित सैकड़ो लोगों को निशुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई। बाद में अस्पताल का और भी विस्तार करते हुए जिला अस्पताल का दर्जा दिलाकर सभी प्रकार के इलाज मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराई गईं। उस समय की हॉस्पिटल के लोकार्पण का शिलालेख आज भी दमोह जिला अस्पताल के मुख्य द्वार के बाजू में लगा हुआ है जिसमें प्रेजेंटेड बाय सिंघई रघुवर प्रसाद का नाम सबसे ऊपर अंकित है मालगुजार दरबारी मजिस्ट्रेट चैयरमैन डिस्टिक काउंसिल जैसे रुतबेदार पद होने उनके पास होने का उल्लेख भी शिलालेख में है डिप्टी कमिश्नर खान बहादुर सैयद जाकिर अली आईएसओ का नाम उद्घाटन कर्ता के तौर पर दर्ज है।
उल्लेखनीय है उस समय इसाई मिशनरी से जुड़े लोगों दमोह में जो अस्पताल संचालित था उसमें वीआईपी लोगों को तो सभी सुविधा मिलती थी लेकिन आम लोगों के उपचार में भेदभाव के साथ धर्म परिर्वतन के लिए भी प्रेरित किया जाता था। यहीं बजह थी कि रघुवर प्रसाद ने शुरूआत में पूरी तरह से स्वदेशी आयुवेर्दिक उपचार पर आधारित सिविल अस्पताल की शुरूआत कराई। जिसकों बाद में अन्य सुविधाओं से युक्त किया गया। दमोह में सिविल अस्पताल के शुरू हो जाने से मिशनरी की अस्पताल के साथ धर्मांतरण का धंधा भी मंदा पड़ने लगने से अंग्रेज रघुवर प्रसाद से खफा रहने लगे थे। वहीं इस दौरान दमोह में खुलने वाले पशु वध केंद्र के प्रस्ताव का विरोध करते हुए रघुवर प्रसाद ध्वज सत्याग्रह में शामिल हो गए। दमोह में जिला परिषद पर ध्वज फहराने के बाद वह प्रेमचंद उस्ताद के साथ जबलपुर भाग गए। जहां नगरपालिका भवन पर हुए ध्वाजारोहण में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही।
नमक कानून की अवज्ञा के बाद दुकानों और शराब बनाने की भट्टियों के सामने हुए धरना प्रदर्शन में भी वह शामिल रहे। इसी दौरान देश भर मे शुरू हुए असहयोग आंदोलन में भी सिंघई परिवार ने खुलकर शामिल होकर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू कर दिया। इस दौरान जुझार गांव की विशाल हवेली के हाथी दरवाजे में लगने वाले महारानी विक्टोरिया के समय के भारी भरकम ताले को दमोह लाकर मिशनरी के अस्पताल पर लगाने की कोशिश भी की गई। सिंघई परिवार के पास में सवा सौ साल पुराना लंदन का बना यह ताला आज भी सुरक्षित है।
क्षेत्र के दबंग तथा प्रभावशाली प्रतिष्ठित सिंघई रघुवर प्रसाद अपने मालगुजारी क्षेत्र में ना तो किसानों से लगान वसूलते थे और न ही अंग्रेजों द्वारा भेजे जाने वाले तहसीलदार आदि को लगान वसूलने देते थे। जुझार गांव मे लगने वाली कचहरी मे आने वाले अधिकांश मामलों में अंग्रेजों के समर्थक लोगों के खिलाफ फैसला सुनाए जाते थे जिससे अंग्रेज इनसे बेहद परेशान थे लेकिन उनके रुतबे की वजह से कुछ नहीं कर पाते थे। क्योंकि यह हमेशा अपने लाल घोड़े पर चाबुक तथा बंदूक के साथ चलते थे उनकी घुड़सवारी व बंदूकबाजी के किस्से दूर.दूर तक फैले हुए थे। उपरोक्त हालात के चलते अंग्रेज उनकों महत्वपूर्ण पदों से हटाने का अवसर तलाश रहे थे वहीं अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ते देखकर रघुवर प्रसाद ने सभी पदों से स्तीफा दे दिया।
1928 में आचार्य शांतिसागर जी शिखरजी तरफ से विहार करते हुए कुंडलपुर पहुचे थे। जिनका सानिध्य प्राप्त करने तथा जुझार गांव तरफ से आगे का विहार करने के लिए पिता हजारीलाल के साथ रघुवर प्रसाद भी कुंडलपुर पहुचे थे। जहां तालाब के सामने स्थित जल मंदिर श्रंख्ला के 53 नबर मंदिर के बाहर उन्होंने आचार्य शांतिसागर जी से दिनोदिन बढ़े रहे अंग्रेजों के अत्याचार को लेकर चर्चा की तो आचार्यश्री ने बिना टेड़ी उंगली किए घी नहीं निकलने का उदाहरण दिया। जिसके बाद उनके मन में कांति की भावनाए हिलोरे मारने लगी थी। बाद में सिंघई परिवार आचार्यश्री शांतिसागर जी के साथ पद विहार करते हुए उनकों कुंडलपुर से बांदकपुर होते हुए जुझार ले गया था। जहां प्राचीन जिनालय के दर्शन आहारचर्या उपरांत आचार्य शांतिसागर जी का नोहटा तक पद विहार कराके जब रघुवर प्रसाद दमोह वापिस लौटे तो वह पूरी तरह से बदल चुके थे।
उन्होंने तत्कालीन स्थानीय क्रांतिकारी प्रेमचंद उस्ताद, गोकुलचंद सिघई आदि से संपर्क किया तथा ख्ुालकर उनका साथ देने लगे। 9 जून 1930 को दो पुलिस कर्मियों पर पत्थरों से हुए हमले में शामिल होकर अंग्रेज पुलिस से सीधी दुश्मनी ले ली। 20 जून व 26 जुलाई को 1930 हुई पत्थरवाजी में भी खुलकर शामिल हुए। इस बीच 1 अगस्त 1930 को गोकलचंद सिंघई की गिरफ्तार पर निकल विशाल विरोध प्रदर्शन जुलूस में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर नारेवाजी की। 8 अगस्त 1930 को गढ़वाल दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इसी दौरान जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव रघुवर प्रसाद मोदी के साथ सिंघई रघुवर प्रसाद को भी पुलिस ने पकड़ लिया तथा तब तक पीटा जब तक वह बेहोश नहीं हो गए।
सिंघई रघुवर प्रसाद चंद्रशेखर आजाद भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों को अपना आदर्श मानते थे। 23 मार्च 1931 को जब लाहौर जेल में भगतसिंह राजगुरू व सुखदेव को फांसी दी गई तो उनका अंग्रेजों के प्रति आक्रोश और भी अधिक बढ़ गया। इधर गांधीजी द्वारा भगतसिंह आदि को फांसी दिए जाने के मामले में प्रतिकार करने के लिए आगे नहीं आने रघुवर प्रसाद ने खुद को गांधी समर्थकों तथा उनकी विचारधारा से दूर कर लिया। यहीं बजह रही कि 29 अक्टूबर 1933 को जब महात्मा गांधी हरिजन गुरूद्वारे की आधारशिंला रखने दमोह आए तो वह उनके कार्यक्रम में शामिल होने भी नहीं पहुचे। जबकि पूरनचंद जैन के द्वारा उनकों गांधी से मुलाकात के लिए अलग से समय लिया गया था। भगतसिंह आदि को फासी की घटना से रघुवर प्रसाद इतने दुखी थे कि उन्होंने गांधी समर्थक स्थानीय कांग्रेस नेताओं से दूरी बना ली तथा सुभाषचंद बोस की आजाद हिंद फोज में शामिल होने के लिए दमोह जेल में बंद बोस समर्थक कुछ नेताओं से मुलाकात करके मार्गदर्शन प्राप्त किया।
इधर अंग्रेजों के खिलाफ लगातार हिंसक प्रदर्शनों के चलते 31 अक्टूबर 1932 को दमोह का जिले का दर्जा खत्म करके उसे सागर का उप संभाग बना दिया गया। जिसके बाद रघुवर प्रसाद दमोह को जिले का दर्जा वापिस दिलाने के लिए खुलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आ गए तथा लोगों को उनका अधिकार दिलाने के लिए भड़काने में जुट गए थे। 1939 में नेताजी सुभाष चंद बोस का जब जबलपुर में त्रिपुरी सम्मेलन आयोजित हुआ तो रघुवर प्रसाद ने भी तिलबारा घाट पहुचकर 21 दिनों तक प्रेमचंद कापड़िया पूरनचंद जैन आदि के साथ प्रशिक्षण प्राप्त किया। उस समय उनकों प्रशिक्षार्थि के रूप में जो बैच बिल्ला मिला था वह कुछ समय पहले तक सिघई परिवार के पास सुरक्षित रहा। त्रिपुरी सम्मेलन से लौट कर आने के बाद रघुवर प्रसाद के तेवर सातवे आसमान पर थे।
1940-41 में राष्टव्यापी झंडा सत्याग्रह के दौरान उन्होंने उसी सिविल अस्पताल के उपर तिरंगा फहरा दिया जिसका निर्माण उन्होंने 15 साल पहले कराया था। वहीं अंग्रेज अधिकारी व पुलिस जब ध्वज हटाने को पहुचे तो रघुवर प्रसाद ने पत्थरों से हमला कर दिया। वहीं अपने घोड़े पर सवार होकर पुलिस को छकाते हुए राजनगर किले में जाकर छिप गए। बाद में वहां से जुझार पहुच गए। जहां लगान वसूली करने पहुंचे एक तहसीलदार को उन्होंने पेड़ से बांधकर चाबुक से तब तक मारा जब तक की वह बेहोश नहीं हो गया। इस घटना के बाद तो अन्य क्षेत्रों के किसानों ने भी लगान देना बंद कर दिया था। जबकि उक्त घटना से अब अंग्रेज रघुवर प्रसाद को अपनी राह का सबसे बड़ा कांटा समझने लगे थे और इनको हटाने की प्लानिंग में जुट गए थे।
सिंघई रघुवर प्रसाद के पौत्र अटल राजेंद्र जैन ने उनके जीवन काल के जुड़े तथ्यों को एकत्र किया है। उन्होंने बताया कि 10 जुलाई 1941 को हिंडोरिया में राजा लक्ष्मण सिंह का तिलक समारोह का आयोजन किया। जिसमें इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति के तौर पर सिंघई रघुवर प्रसाद को विषेष तौर पर आमंत्रित किया गया। जहां पहले से घात लगाए अंग्रेजों ने उनको परोसे जाने वाले वीआईपी भोजन में छल पूर्वक जहर मिला दिया। जहर युक्त भोजन करने के बाद रघुवर प्रसाद जी की हालात बिगड़ने पर उनकों इलाज के लिए दमोह भेजने के बजाए उनके प्रिय घोड़े से बांधकर घोड़े को चाबुक मारकर दौड़ा दिया गया। दोपहर बाद बेहोशी की हालत में घोड़ा उनको लेकर जुझार पहुचा जहां पुनः अंग्रेजों के इशारे पर उपचार के नाम पर जहर से भरे इंजेक्शन उनकों लगा दिए गए। जिससे शाम को उनका निधन हो गया। इस समय उनके इकलौते बेटे रतनचंद की उम्र महज पांच वर्ष थी। उनकी जान को भी खतरा होने की बजह से धर्मपत्नि इंद्रानी बहू बेटे रतन को साथ लेकर गुमनामी का जीवन जीने निकल गई। बाद में देश के आजाद होने के बाद जब वह जुझार वापिस लौटी तो मालगुजारी की सारी जमीन जायजाद जा चुकी थीं। बेटे रतनचंद की नाबालिगी में दर्ज एक बगीचा व खंडहर हवेली ही शेष बची थी। इसी को आगे जीवन यापन का जरिया बनाते हुए बेटे रतनचंद का लालन पालन हुआ लेकिन उनके जीवन से यह गुमनामी का अंधेरा नहीं छट सका।
क्यों कि सिंघई रघुवर प्रसाद की दबंगई के किस्सों से लेकर उनके द्वारा अंग्रेजों को छकाकर लोहे के चने चबाने जैसे हालात बनाने के किस्से इतिहास के किसी पन्ने में दर्ज करने वाला कोई नहीं था। हालांकि जिला अस्पताल मंदिरों कुआ हवेली आदि में लगे शिलालेख आज भी सिंघई परिवार के प्रभुत्व से लेकर धर्म समाजसेवा राजनीति तथा अंग्रेजों के खिलाफ उनके योगदान बातने को काफी है। लेकिन इतिहास के पन्नों में आजादी के 79 साल बाद भी इनकों कोई जगह नहीं मिलने से जुझार के दानवीर चौधरी सिंघई परिवार के साथ सिंघई रघुवर प्रसाद आज भी गुमनाम सेनानी ही है। ऐसे न जाने कितने गुमनाम सेनानी ओर रहे होगे जिन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे करने में अपना योगदान दिया होगा।
Updated on:
12 Aug 2026 08:12 pm
Published on:
12 Aug 2026 08:11 pm
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