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पुष्पेन्द्र सिंह
दंतेवाड़ा. मजदूर के सीने में दर्द नहीं होता है, यह कड़वा सच है। क्योंकि वह मेहनतकश इंसान होता है। अपने खून पसीने की कमाई खाता है। दंतेवाड़ा वेयर हाउस में काम कर रहे मजदूरों को कसक है, तो इस बात की उसका हक उसी से ही छीना जा रहा है। यह कसक असहनीय तब और हो जाती है जब अधिकारियों के दिए जाने वाले पैसे पर हस्ताक्षर और मुहर मजदूर को ही लगानी पड़ती है। उसकी मेहनत के एक हिस्से का बंदरवांट अधिकारी करते हैं। यहां काम कर रहे हमालों की हमाली को हलाल कर अधिकारी खा कर लाल हो रहे हैं।
दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है
एक वेयरहाउस में दिन भर में 20 से 25 गाडिय़ां पहुंचती है। एक ट्रक में 340 बोरी तक होती है। एक बोरी का मजदूरों को 5 रुपए दिया जाता है। एक ट्रक पर उनको 1700 रुपए मजदूरी मिलती है। इस मजदूरी को पाने के लिए उनको 2400 रुपए की पावती पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। हमाल संघ के अध्यक्ष बिजोराम बताते हैं कि दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है, आवाज उठाने का कोई फायदा नहीं है। अधिकारियों का एक्सट्रा पैसा लगता ही है।
5 रुपए बोरी बहुत कम होता है
वह गेटपास के नाम ट्रक मालिकों व चालकों से यह वसूली करते हैं। हम तो हस्ताक्षर और मुहर भर लगाते हैं। यह सच है यह पैसा मजदूरों को मिलना चहिए। 5 रुपए बोरी बहुत कम होता है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और भिलाई जैेसे बड़े शहरों में हमाली यहां से कहीं ज्यादा है। हमारा हिस्सा हमसे अधिकारी छीन कर खा रहे हैं और हम कुछ कह भी नहीं पाते।
तीन वेयर हाउस, सभी जगह हमालों के पैसे पर डाला डाका
जिले में तीन जगह वेयर हाउस है। इन तीनों वेयर हाउस का प्रभार शाखा प्रबंधक पीके गर्ग के पास है। तीनों वेयर हाउस की बात की जाए तो करीब 25 से 30 ट्रक खाली होता है। कभी यह संख्या बढ़ भी जाती है। प्रत्येक ट्रक से 700 रुपए वसूला जा रहा है। एक दिन में मजदूरों के हक पर करीब 20 से 40 हजार रुपए का डाका डाला जा रहा है। इस मामले की जांच करने अधिकारी पहुंचते है तो वे भी चुप हो जाते है। उनकी चुप्पी भी इस डाके में सहभागिता की ओर इशारा करती है। फिलहाल गीदम, दंतेवाड़ा और कुआकोंडा में मजदूरों के हक पर डाके का खेल बदस्तूर जारी है।
Published on:
27 Aug 2017 05:45 pm
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