
लबालब भरा मोरेल बांध. Photo- Patrika
लालसोट। दौसा और सवाई माधोपुर जिले के सैकड़ों गांवों की जीवनरेखा माने जाने वाला एशिया का सबसे बड़ा कच्चा बांध मोरेल इस बार अनोखी और चिंताजनक स्थिति में है। लगातार दो वर्षों से मानसून में भरने वाला यह बांध इस वर्ष बारिश शुरू होने से पहले ही लगभग पूरा भर चुका है। 30 फीट 5 इंच क्षमता वाले बांध में जलस्तर 29 फीट 4 इंच तक पहुंच गया है और पानी वेस्ट वेयर को छूने की स्थिति में है। यदि कैचमेंट क्षेत्र में 50 मिमी के आसपास बारिश होती है तो मानसून पूर्व ही बांध पर चादर चल सकती है, जो इतिहास में पहली घटना होगी।
विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों के अनुसार बांध में पानी की आवक बारिश से नहीं, बल्कि जयपुर के सांगानेर क्षेत्र की रंगाई-छपाई इकाइयों से निकल रहे प्रदूषित रासायनिक अपशिष्ट के कारण हो रही है। यह पानी द्रव्यवती, ढूंढ और मोरेल नदी के रास्ते लगातार बांध तक पहुंच रहा है। भीषण गर्मी में भी मोरेल नदी में नियमित जलप्रवाह बना हुआ है, जिससे बांध भराव क्षमता के करीब पहुंच गया है।
स्थानीय विधायक रामबिलास मीना 23 फरवरी को विधानसभा में यह मुद्दा उठा चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बांध का पानी सिंचाई में उपयोग होता है, लेकिन प्रदूषण के कारण फसल और जनस्वास्थ्य दोनों खतरे में हैं। उन्होंने कानोता या सांभरिया क्षेत्र में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की मांग भी रखी थी।
ग्रामीणों और पर्यावरणविदों का कहना है कि लंबे समय तक औद्योगिक अपशिष्ट मिश्रित पानी के संग्रहण से कृषि भूमि की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। वहीं प्रदूषण के कारण जलपक्षियों ने भी दूरी बनानी शुरू कर दी है। पक्षी विशेषज्ञ प्रो. सुभाष पहाड़िया ने चेतावनी दी कि हालात नहीं सुधरे तो मोरेल बांध प्रवासी पक्षियों के मानचित्र से गायब हो सकता है।
सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता चेतराम मीना के अनुसार वर्तमान में मोरेल नदी से करीब 100 क्यूसेक (लगभग 2800 लीटर प्रति सेकेंड) पानी बांध में पहुंच रहा है। उन्होंने बताया कि प्रदूषित पानी की समस्या से उच्चाधिकारियों को लगातार अवगत कराया गया है। उनके अनुसार पानी फिलहाल सिंचाई योग्य है, लेकिन पेयजल उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं है और इसके शोधन की आवश्यकता है।
Updated on:
20 Jun 2026 07:11 pm
Published on:
20 Jun 2026 11:33 am
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