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टेकरी में शिकार कथा की निशानी है चिरंजीव स्मारक 

इतिहासकार जाधव ने राष्ट्रीय स्मारक का किया खंडन 

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Kamal Singh

Dec 24, 2016

Dewas

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देवास. इतिहास के जानकार दिलीप सिंह जाधव माता टेकरी पर स्थित स्मारक को स्वतंत्रता से जुड़ा स्मारक नहीं मानते हैं, बल्कि इसे चिरंजीव स्मारक बताया है। यह 1938 में तब बनवाया गया था, जब जूनियर स्टेट के युवराज यशवंतराव पवार, सरदार राव साहेब मोहिते व राव साहेब हरोड़े किरगांव (खंडवा) के जंगलों में शिकार के दौरान बाघिन के हमले से बच गए थे। लौटने के बाद जूनियर स्टेट के राजा ने टेकरी पर चिरंजीव स्मारक का निर्माण कराया था।
इतिहासकार जाधव ने स्पष्ट किया है कि चामुंडा टेकरी स्थित झाडिय़ों में लुप्त कथित स्मारक जिसके बारे में कांग्रेस के भगवान सिंह चावड़ा ने कलेक्टर से जीर्णोद्धार की मांग उठाई है। वह स्मारक 1857 की क्रांति का स्मारक नहीं है। वास्तव में यह स्मारक 21 मई 1938 को तत्कालीन जूनियर स्टेट के युवराज यशवंतराव पवार, सरदार राव वाहेब मोहिते तथा राव साहेब हरोडे इन तीनों प्रख्यात शिकारियों की खंडवा के पास किरगांव के जंगल में एक घायल बाघिन के साथ जमीन पर आमने-सामने हुए संघर्ष का स्मारक है। घायल बाघिन के आक्रमण से ये तीनों गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तीनों बाल-बाल बचे थे। शिकार कथा का वर्णन अमरीका के स्तंभकार डॉन कॉमिसारो ने अखबार टाइम पिकायून के मैगजीन सेक्शन में 24 जुलाई 1938 को एक स्तंभ लिखा था। जो गलत सूचनाओं के आधार पर प्रकाशित किया गया था। कामिसारो ने अपने लेख द लॉ ऑफ जंगल में इस लड़ाई को जूनियर नरेश खासे साहेब पवार और एक तेंदुए के बीच मुठभेड़ बताया था। 1938 को प्रकाशित इस त्रुटिपूर्ण समाचार का सही चित्रण दिलीपसिंह जाधव ने 31 मई 2010 को अपने लेख में इस शिकार कथा की सच्चाई बताई थी।