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विश्व आदिवासी दिवस पर शिक्षा की मशाल, 500 आदिवासी बच्चों के भविष्य की रोशनी बने एमपी के 71 वर्षीय ‘गुरूजी’

World Tribal Day : भारत सिंह सारेल मूल रूप से झाबुआ के संदला निवासी हैं। बच्चे और समाज के लोग उन्हें सम्मान से 'गुरूजी' कहकर पुकारते हैं।
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World Tribal Day

World Tribal Day (500 आदिवासी बच्चों के भविष्य की रोशनी बने 'गुरूजी' Photo Source- Patrika)

Dhar News : अपनी जिंदगी संवारने के लिए संघर्ष करने वाले तो बहुत मिलते हैं, लेकिन जो अपनी पूरी जिंदगी किसी समुदाय की अगली पीढ़ी का भविष्य संवारने में लगा दे, वह मिसाल बन जाता है। मध्य प्रदेश के धार जिले के अंतर्गत आने वाले नालछा ब्लॉक के काकलपुरा में रहने वाले 71 वर्षीय भारत सिंह सारेल पिछले करीब 3 दशक से ऐसा ही काम कर रहे हैं।

सिर्फ धार ही नहीं बल्कि झाबुआ, बड़वानी और आलीराजपुर के वनवासी क्षेत्रों में भी बच्चे और समाज के लोग उन्हें सम्मान से 'गुरूजी' कहकर पुकारते हैं। सारेल द्वारा संचालित आश्रम में 500 आदिवासी बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार, अनुशासन और आत्मनिर्भर बनने के लिए पारंपरिक काम सिखाए जा रहे हैं।

शिक्षा को बनाया लक्ष्य

भारत सिंह सारेल मूल रूप से झाबुआ जिले के संदला इलाके के रहने वाले हैं। साल 1965 के आसपास पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कठिन हो गई। अभावों के बीच उन्होंने किसी तरह हायर सेकेंडरी तक शिक्षा पूरी की। इसके बाद इंदौर में लाइब्रेरी में नौकरी मिली। इसी दौरान आकाशवाणी में भजन मंडली के साथ अतिरिक्त काम करने का अवसर भी मिला। काकलपुरा आने का अवसर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। यहां समुदाय में शिक्षा की कमी को करीब से देखा तो मन में बच्चों के लिए कुछ करने का विचार आया। गुरु पूर्णिमा के दिन ग्रामीणों के सहयोग से आश्रम की नींव रखी। शुरुआती वर्षों में नौकरी और आश्रम के बीच आनाजाना चलता रहा। बाद में काकलपुरा को ही अपनी कर्मस्थली बना लिया।

'शिक्षित पीढ़ी ही बदलेगी समाज की तस्वीर'

विश्व आदिवासी दिवस पर गुरूजी सारेल की तीन दशक लंबी यात्रा बताती है कि समाज में बदलाव केवल भाषणों से नहीं, लगातार किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से आता है। उन्होंने अपना जीवन ऐसे बच्चों के नाम किया, जिनके लिए शिक्षा कभी आसान अवसर नहीं थी। काकलपुरा का आश्रम आज सिर्फ भवन नहीं, बल्कि तीन दशक से जल रही वह शिक्षा की मशाल है, जिसकी रोशनी में 500 बच्चों के सपने आकार ले रहे हैं।

शिक्षा के साथ संस्कार और आत्मनिर्भरता

गुरूजी सारेल का मानना है कि बचपन में मिले संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। आश्रम में बच्चों में एकाग्रता, अनुशासन और ज्ञान के प्रति रुचि विकसित करने पर जोर दिया जाता है। साथ ही पारंपरिक काम और हुनर सिखाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार किया जाता है। सारेल सामाजिक कुरीतियों और नशे को समुदाय के विकास में बड़ी बाधा मानते हैं। उनका संदेश है कि समाज को कुरीतियों से बाहर निकलकर शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए।