जलती होली की लौ एवं धुआं करता है "होनी-अनहोनी" की भविष्यवाणी, जानें कैसे..

होली के धुएं का अद्भुत रहस्य

By: Shyam

Published: 07 Mar 2020, 04:17 PM IST

हिन्दू संस्कृति में प्रचलित प्रायः समस्त उत्सवों में होलिकोत्सव का विशेष महत्व है। इसका सर्व-सामान्य स्वरूप केवल भारत के विभिन्न भागों में ही नहीं बल्कि संसार के अन्य राष्ट्रों में भी किसी न किसी रूप में पाया जाता है। होली उत्सव के दो अंग आर्य संस्कृति में पाये जाते हैं। एक है होलिका-दहन और उसके वसन्त का उत्सव मानना, अबीर, गुलाल जैसे नेत्र रञ्जक रंगों को छोड़ना, छुड़वाना और साथ ही साथ होली, फाग, झूमर-वसन्त आदि रागों को गा-बजाकर उत्सव एवं समारोह मनाना।

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शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम पूर्णिमा तिथि को होली का उत्सव मनाया जाता है और पूर्णिमा को ही होली जलानी चाहिए। जिस दिन प्रदोष के समय पूर्णिमा वर्तमान हो, भद्रा न हो, उस दिन सूर्यास्त के उपरान्त ही होली जलाने का विधान है। भद्रा के आरंभ की पांच घड़ी ‘भद्रा का मुख’ और इसके उपरान्त की तीन घड़ी ‘भद्रा की पूंछ’ कही जाती है। होली सर्वसाधारण का त्यौहार है और इस दिन छोटे-बड़े ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाकर सभी परस्पर हिलमिल कर इस समारोह को प्राचीन काल से ही मनाते आए हैं। यह इसी से स्पष्ट है कि हमारे शास्त्रों में इस दिन चाण्डाल के स्पर्श करने का विशेष महत्व वर्णित है।

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भविष्य पुराण में तो यहां तक लिखा है कि जो व्यक्ति इस दिन चाण्डाल का स्पर्श करता है, उसे आगामी वर्ष किसी प्रकार की विपत्ति या आधि-व्याधि नहीं सताती है। कुछ शास्त्रों में चाण्डाल स्पर्श के स्थान पर केवल दर्शन का ही विधान बताया गया है।

जलती होली की लौ एवं धुआं करता है

होलिकोत्सव में बच्चों के आमोद-प्रमोद पर विशेष रूप से जोर दिया गया है। इस अवसर पर उन्हें निःशंक होकर मनमाने तौर से हंसने बोलने, खेलने कूदने एवं गाने बजाने की पूर्ण छूट दी गई है- समरोत्सुक योद्धाओं की भांति बच्चों को लकड़ी की तलवार लेकर अत्यन्त हर्ष एवं उल्लासपूर्वक घर से बाहर निकलकर खेल-कूद मचाना चाहिए, किन्तु होली की रात्रि के समय बच्चों की रक्षा के बारे में भविष्योत्तर पुराण कहता है।

जलती होली की लौ एवं धुआं करता है

होली के धुएं का रहस्य

होलिका दहन के धुएं के बारे में सजक पुराणों एवं फलित ज्योतिष के ग्रंथों में लिखा है कि यदि होलिका की लपटें पूर्व दिशा की ओर जायं तो वह राजा प्रजा के लिए सुख-समृद्धि का संकेत है। अग्निकोण में अग्नि का भय, दक्षिण तथा नैऋत्य में दुर्भिक्ष, युद्ध, संकट की संभावना, उत्तर में समस्त राष्ट्र को अन्न सुख, ईशान में प्रजा में सुख-शाँति, पच्छिम में विपुल वृष्टि, वायव्य में आँधी तूफान का संकेत है।

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