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जया एकादशी 12 को, जीवन और मरण के बंधन से मुक्ति मिल होती है मोक्ष की प्राप्ति

- व्रत का पारण 13 फरवरी को, करते हैं भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण अवतार की पूजा धौलपुर. हिन्दू धर्म में जया एकादशी का यह व्रत बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। मान्यता के अनुसार इस दिन जो जातक श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं उन्हें भूत-प्रेत, पिशाच जैसी योनियों में जाने का भय नहीं रहता है। ऐसे जातकों के जीवन और मरण के बंधन से मुक्ति मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार जया एकादशी 12 फरवरी दिन शनिवार को है। व्रत का पारण अगले दि

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 On Jaya Ekadashi 12, one gets freedom from the bondage of life and death, attainment of salvation

जया एकादशी 12 को, जीवन और मरण के बंधन से मुक्ति मिल होती है मोक्ष की प्राप्ति

जया एकादशी 12 को, जीवन और मरण के बंधन से मुक्ति मिल होती है मोक्ष की प्राप्ति

- व्रत का पारण 13 फरवरी को, करते हैं भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण अवतार की पूजा

धौलपुर. हिन्दू धर्म में जया एकादशी का यह व्रत बहुत ही पुण्यदायी माना गया है। मान्यता के अनुसार इस दिन जो जातक श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं उन्हें भूत-प्रेत, पिशाच जैसी योनियों में जाने का भय नहीं रहता है। ऐसे जातकों के जीवन और मरण के बंधन से मुक्ति मिलकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार जया एकादशी 12 फरवरी दिन शनिवार को है। व्रत का पारण अगले दिन 13 फरवरी को होगा। इस दिन जातक सुबह 7:01 बजे से 9:15 बजे तक यानि 2 घंटे 13 मिनट की अवधि में जया एकादशी के व्रत का पारण कर सकते हैं।जया एकादशी व्रत पूजा विधिजया एकादशी व्रत के लिए एक दिन पहले नियम शुरू हो जाते हैं। यानि व्रत से पूर्व दशमी के दिन एक ही समय सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। व्रत करने वालों को ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए। प्रात:काल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेकर धूप, दीप, फल और पंचामृत आदि अर्पित करके भगवान विष्णु के श्रीकृष्ण अवतार की पूजा करें। रात्रि में जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करें। द्वादशी के दिन किसी जरूरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।जया एकादशी व्रत की पौराणिक कथापौराणिक कथा के अनुसार एक बार इंद्र की सभा में उत्सव चल रहा था। देवगण, संत, दिव्य पुरुष सभी उत्सव में उपस्थित थे। उस समय गंधर्व गीत गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य कर रही थीं। इन्हीं गंधर्वों में एक माल्यवान नाम का गंधर्व भी था जो बहुत ही सुरीला गाता था। जितनी सुरीली उसकी आवाज थी उतना ही सुंदर रूप था। उधर गंधर्व कन्याओं में एक सुंदर पुष्यवती नामक नृत्यांगना भी थी। पुष्यवती और माल्यवान एक-दूसरे को देखकर सुध-बुध खो बैठते हैं और अपनी लय व ताल से भटक जाते हैं। उनके इस कृत्य से देवराज इंद्र नाराज हो जाते हैं और उन्हें श्राप देते हैं कि स्वर्ग से वंचित होकर मृत्यु लोक में पिशाचों सा जीवन भोगोगे। श्राप के प्रभाव से वे दोनों प्रेत योनि में चले गए और दुख भोगने लगे। दोनों बहुत दुखी थे। एक समय माघ मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन था। पूरे दिन में दोनों ने सिर्फ एक बार ही फलाहार किया था। रात्रि में भगवान से प्रार्थना कर अपने किए पर पश्चाताप भी कर रहे थे। इसके बाद सुबह तक दोनों की मृत्यु हो गई। अनजाने में ही सही लेकिन, उन्होंने एकादशी का उपवास किया और इसके प्रभाव से उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई और वे पुन: स्वर्ग लोक चले गए।