
खदाने बन्द होने से बेकार पड़े खनन उपकरण
Dholpur, सरमथुरा.जिले में धौलपुर करौली टाइगर अभ्यारण्य बनने के बाद ही पत्थर उद्योग सहित इकाइयां दम तोडऩे लगी हैं। गत एक साल में पत्थर इकाइयों से आधा उत्पादन बंद हो चुका है। कभी दिन-रात संचालित पत्थर इकाइयां अब महज 08 से 10 घंटे ही चल रही हंै। इसका मुख्य कारण आए दिन छापेमारी और वाहन जब्ती से लाल पत्थर की खदानें बंद होने के साथ सरकार से प्रोत्साहन की कमी और नियमों की जटिलता है। इधर, पत्थर इकाइयां बंद होने से इससे जुड़े करीब 10 हजार से अधिक परिवार भी आर्थिक रूप से प्रभावित हुए हैं।
गैंगसा उद्यमी योगेश शर्मा, सुरेश गर्ग, महावीर मंगल, शंकर सिंह जादौन, जायद खान आदि ने बताया कि धौलपुर जिले में टाइगर अभ्यारण्य बनने से पत्थर उद्योग गर्त में पहुंच गया है। इसका असर यह है कि पर्यावरण मंत्रालय ने 10 किमी दायरे में इको-सेंसिटिव जोन घोषित किया हुआ है, जिससे पत्थर खनन बंद होने के कगार पर पहुंच गया है।
पत्थर इण्डस्ट्री के जानकारों के अनुसार यदि सरकार धौलपुर जिले के पत्थर उद्योग को जीवित रखने के लिए थोड़ा भी प्रयास करे तो इस उद्योग को बचाया जा सकता है। उद्यमी बताते हैं कि पड़ोसी जिले भरतपुर के बंशी पहाड़पुर की तर्ज पर पर्यावरण मंत्रालय ने इको-सेंसिटिव जोन का दायरा घटा कर एक किमी तक किया जाए तो लाल पत्थर की खदानें फिर शुरू हो सकती हंै और पत्थर इण्डस्ट्री को बूस्टअप मिल सकता है।
10 किमी की परिधि में खनन की अनुमति नहीं
धौलपुर-करौली क्षेत्र अब एक अधिसूचित टाइगर रिजर्व बन गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इस संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र और इसके आसपास के इको-सेंसिटिव जोन में 10 किमी की परिधि में किसी भी प्रकार के व्यावसायिक या नए खनन कार्य की अनुमति पूरी तरह से प्रतिबंधित है। इसका असर यह है कि खनन विभाग ने अधिकृत खदानों को पर्यावरण मंजूरी नहीं मिल रही, जबकि पड़ोसी जिले भरतपुर में विभाग द्वारा इको-सेंसिटिव जोन का दायरा एक किमी निर्धारित किया हुआ है।
मासलपुर रीको में शिफ्ट होने लगी इकाइयां
धौलपुर में पत्थर की खदानें बंद होने के बाद उद्यमियों ने मासलपुर रीको में इकाइयों को शिफ्ट करना शुरू कर दिया है। इसके पीछे मुख्य कारण रॉ मैटेरियल नहीं मिलना है। अधिकतर माइन्स सलेंडर होने और रोजाना की धरपकड़ होने से कीमतें बढ़ गई है, जिससे सामान्य इकाइयां रॉ मैटेरियल खरीद ही नहीं पाती है।
रॉ मैटेरियल की कीमत बढ़ी, पत्थर की डिमांड कम हुई
जिले में पत्थर उद्योग ही मुख्य रूप से लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता था, जो सरकार की नीतियों के कारण ही खत्म हो गया है। सबसे गंभीर बात यह है कि एक साल में रॉ मैटेरियल की कीमतों में 50 प्रतिशत का इजाफा हो गया है, वहीं इतनी ही मजदूरी बढ़ गई है। वैसे, सिरेमिक टाइल्स और अन्य पत्थरों की बढ़ती डिमांड से लाल पत्थर की मार्केट में डिमांड कम हुई है।
आधी से ज्यादा खनन लीज हुई बंद
जिले में खनिज एवं भू विज्ञान विभाग ने करीब पौने दो सौ खनन पट्टों को स्वीकृत किया हुआ था। पर्यावरण स्वीकृति नहीं मिलने के कारण जिले में आधी से ज्यादा खदानें बंद पड़ी हैं। इससे खनन का काम रुक गया है, वहीं ट्रांसपोर्ट और कामगारों के सामने रोजगार का बड़ा संकट आ गया है। अब यह खदानों का आंकड़ा दो अंकों में आकर सिमट गया है।
Updated on:
27 Jul 2026 06:27 pm
Published on:
27 Jul 2026 06:27 pm
