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मनीष उपाध्याय
dholpur, राजाखेड़ा. एक ओर विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों को बचाने करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राजाखेड़ा क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण के दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आते हैं। यहां चम्बल व उत्तनगन नदी के विशिष्ठ बीहड़ व खांदरों से दिन रात जारी अवैध मिट्टी खनन, वनों की कटाई और इस सबसे वातावरण में हमेशा छाए धूल प्रदूषण के गुबार से पर्यावरणीय संतुलन पर लगातार खतरा मंडरा रहा है।
क्षेत्रीय लोगों के अनुसार राजाखेड़ा क्षेत्र में वैध और अवैध रूप से करीब 100 से अधिक ईंट भ_े संचालित हैं। इन भ_ों की मांग पूरी करने के लिए खेतों की उपजाऊ मिट्टी बड़े पैमाने पर दशकों से खनन की जा रही है। कई स्थानों पर खेतों के बीच मिट्टी के विशाल पहाड़ जैसे नजर आते हैं, जो इस कारोबार की गहराई को बयां करते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि खेती की सबसे उपजाऊ परत हटने से भूमि की उत्पादकता नष्ट होती जा रही है। जिस जमीन से किसानों की रोजी-रोटी जुड़ी है, वही जमीन धीरे-धीरे अपनी उर्वरता खोती जा रही है।
बीहड़ों में सघनता से सक्रिय मिट्टी माफियाओं का जाल
राजाखेड़ा की सीमाएं उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से लगती हैं। इसका फायदा उठाकर मिट्टी का कारोबार लगातार फैल रहा है। आरोप है कि बीहड़ क्षेत्रों में आधुनिक मशीनों से बड़े पैमाने पर मिट्टी का दिन रात अवैध खनन किया जा रहा है और डंफरों के जरिए इसे दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचाया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सीमावर्ती मार्गों पर प्रभावी निगरानी नहीं होने से मिट्टी से भरे वाहन बेखौफ होकर गुजरते हैं। ऐसे में प्रशासनिक तंत्र की सक्रियता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
डोंगरपुर रोड पर उड़ती धूल, सांस लेना हुआ दुष्कर
भट्टा नगरी के रूप में विख्यात राजाखेड़ा-डोंगरपुर मार्ग, आगरा मार्ग, धनोला मार्ग, सिंघावली मार्ग, व अन्य सभी मार्ग जहां भट्टे स्थापित हैं वहां हाल बेहाल हैं। शहरी क्षेत्र में भी कई दर्जन अवैध भट्टे काला धुंआ उगल रहे हैं तो डंफरों की आवाजाही से हालात चिंताजनक बने हुए हैं। सडक़ पर उड़ती धूल के कारण ग्रमीणों, राहगीरों और वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई बार धूल के गुबार के कारण दृश्यता प्रभावित होने से दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है। इसी मार्ग पर राजकीय महाविद्यालय भी स्थित है, जहां प्रतिदिन सैकड़ों विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते-जाते हैं। छात्रों का कहना है कि भारी वाहनों के दबाव और धूल के कारण उनका सफर जोखिम भरा हो गया है।
आधुनिक मशीनों से खनन में तेजी
क्षेत्र में जेसीबी, पोकलेन जैसी भारी मशीनों, ट्रेक्टरों, डंफरों और अन्य भारी उपकरणों की मदद से मिट्टी खनन की रफ्तार विगत दशक में कई गुना हो चुकी है। कई स्थानों पर दिन-रात खनन कार्य जारी रहता है। इससे न केवल खेतों की प्राकृतिक बनावट प्रभावित हो रही है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बनने में वर्षों लग जाते हैं, लेकिन इसे कुछ घंटों में ही हटाया जा रहा है। इसका खामियाजा भविष्य में कृषि क्षेत्र को भुगतना पड़ सकता है।
पेड़ कटाई से खो गए जंगल...
सरकारें एक ओर पेड़ लगाओ, पेड़ बचाओ अभियान चला रही हैं। वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में हरित क्षेत्र के कम होने और पेड़ों की कटाई की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि खनन और अन्य गतिविधियों के कारण हरियाली प्रभावित हो रही है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगडऩे का खतरा बढ़ रहा है।
सरकारी जमीन पर भी खनन के आरोप
उपखंड के समौना गांव के गढ़ी टीडावली निवासी भाजपा नेता राजू तिवारी ने अवैध खनन के फोटो वीडियो उपखंड से जिला प्रशासन तक भेजकर समौना गांव के बीहड़ क्षेत्र में सरकारी और शिवायचक, चारागाह भूमि से भी मिट्टी निकाले जाने के आरोप लगाए। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। लोगों का आरोप है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के साथ-साथ सरकारी राजस्व को भी नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
पर्यावरण दिवस केवल औपचारिकता
विश्व पर्यावरण दिवस पर जब पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई जा रही है, तब राजाखेड़ा के हालात कई सवाल खड़े करते हैं। यदि इसी तरह मिट्टी खनन, धूल प्रदूषण और हरियाली का क्षरण जारी रहा तो आने वाले समय में क्षेत्र को पर्यावरणीय असंतुलन, जल संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अब सवाल यह है कि क्या पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रमों और भाषणों तक सीमित रहेगा, या फिर धरातल पर भी प्रकृति को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे।
Published on:
05 Jun 2026 07:21 pm
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