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Health Tips: बेमौसम के फल और सब्जियां कर सकते हैं बीमार

Health Tips: बिना मौसम के बाजार में बिकने को आ रही फल-सब्जियों को रसायनों का इस्तेमाल कर पकाया जाता है। इसके अलावा इन्हें ताजा रखने और दिखाने के लिए इन पर मोम

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Deovrat Singh

Aug 20, 2021

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Health Tips: बीना मौसम का खानपान आजकल फैशन का रूप लेता जा रहा है। सर्दी में तरबूज और गर्मी में अमरूद आपको बाजार में नजर आ जाएंगे। लेकिन यह फैशन कई बीमारियों को भी अपने साथ लेकर आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार सीजन के अनुसार खानपान ही आपको अच्छा स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती दे सकता है।

बेमौसम फल-सब्जी यानी केमिकल्स का सेवन

बिना मौसम के बाजार में बिकने को आ रही फल-सब्जियों को रसायनों का इस्तेमाल कर पकाया जाता है। इसके अलावा इन्हें ताजा रखने और दिखाने के लिए इन पर मोम और केमिकल्स की पॉलिश भी की जाती है। जोधपुर के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. अशोक सिंह राठौड़ बताते हैं कि फलों पर पॉलिशिंग करने का सिलसिला काफी समय से चल रहा है। इनके सेवन से पीलिया या आंत्रशोथ जैसी बीमारियों का खतरा मंडराया रहता है।

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जानकारों के मुताबिक कुछ सब्जियों और फलों खासकर कद्दूवर्गीय (कद्दू, लौकी, तरोई, खीरा, ककड़ी आदि) और कड़वे स्वाद वाली सब्जियों, करेला छोडक़र, स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है, लेकिन इनमें थोड़ी मात्रा टॉक्सिन की भी होती है।

रसायनों के इस्तेमाल से टॉक्सिन की यह मात्रा कई गुणा तक बढ़ जाती है। ऐसे में यह जानलेवा भी हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक टॉक्सिन एक तरह का प्रोटीन होता है, जो किसी भी जीवित चीज में पाया जाता है। टॉक्सिन जहरीला होता है। इसकी संतुलित मात्रा से कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि शरीर में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का मुकाबला करने में भी यह सहायक होता है। लेकिन टॉक्सिन की ज्यादा मात्रा से इंसान की मौत भी हो सकती है।

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शरीर के लिए हो सकते हैं घातक

बे मौसम फल और सब्जियों का उत्पादन करते समय डीडीटीए बीएचसी समेत अनेक रासायनिक कीटनाशकों का विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है। जिससे फल-सब्जी में जेनेटिक डिसऑर्डर, हार्मोनल चेंज, असामान्य विकास के अलावा फल और सब्जी के रंग-गंध व स्वाद में बदलाव आ जाता है। इससे कैंसर जैसी भयावह बीमारियां होने का भी खतरा बढ़ जाता है।

सालभर मुहैया करवाने के लिए फलों- सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता है। ये फल लम्बे समय तक ताजा जरूर दिखाई देते हैं, लेकिन फ्रीजर में प्रयुक्त फ्रिऑन (क्लोरोफ्लोरो कार्बन) व अन्य रासायनिक पदार्थ इन्हें बीमारी का घर बना देते हैं।

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फल-सब्जियां खाएं लेकिन संभलकर

फल-सब्जियों को धोकर ही इस्तेलाल करना चाहिए। इससे इन पर जमी केमिकल्स की परत साफ हो जाती है। इसके अलावा टॉक्सिन का प्रभाव भी कम होता है। आमतौर पर लोगों की धारणा यह रहती है कि फलों के छिलके में ही स्वास्थ्यवद्र्धक तत्व होते हैं।

ऐसे में छिलका नहीं निकालना चाहिए, लेकिन खान-पान की समझ रखने वाली मृदुला विनीत सनाढ्य का मानना है कि सेब, नाशपाती जैसे फलों को छीलकर ही खाना चाहिए वरना अल्सर या पाचन संबंधी कई बीमारियों के चपेट में आ सकते हैं। डिब्बाबंद ज्यूस और खाद्य सामग्री को लेकर भी वे ऐसी ही राय रखती है।

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इनमें मिलाए जाने वाले पिजर्वेटिव्स कई बार एलर्जिक और नुकसानदायी हो सकते हैं। बकौल मृदुला- हर मौसम के फल की तासीर और गुण अलग-अलग होते हैं। ‘क्रॉस-सीजन फूड’ ऋतुजनित समस्याओं को बढ़ा देता है। प्रिजव्र्ड और फ्रोजन फूड में पोषक तत्वों की भी कमी हो जाती है।

इसमें स्वाद तो हो सकता है, लेकिन सेहत के लिए इन्हें अच्छा नहीं कहा जा सकता। फ्रीजिंग प्रोसेस में फूड की न्यूट्रिशंस वैल्यू बहुत कम हो जाती है। विटामिन बी और विटामिन सी तो तकरीबन खत्म ही हो जाते हैं। फ्रोजन फूड में विटामिन सी तकरीबन 50 फीसदी तक समाप्त हो जाता है।