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सावधान! कहीं सांसों पर हावी न हो जाए अस्थमा

अस्थमा रोग श्वास नलिकाओं को प्रभावित करता है। श्वास नलिकाएं फेफड़ों से हवा को अंदर-बाहर करने का काम करती हैं।

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 Asthma

सावधान! कहीं सांसों पर हावी न हो जाए अस्थमा

अस्थमा रोग श्वास नलिकाओं को प्रभावित करता है। श्वास नलिकाएं फेफड़ों से हवा को अंदर-बाहर करने का काम करती हैं। अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन आ जाती है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देती हैं और किसी भी बेचैन करने वाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करती हैं।

जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं तो उनमें संकुचन होता है और फेफड़ों में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, सुबह व रात में सांस लेने में तकलीफ होने लगती है।

प्रमुख लक्षण
बलगम या बिना बलगम के लगातार खांसी होना, मूड में बदलाव, छींकें आना, सांस लेते समय अधिक जोर लगाने से मुंह लाल होना, सांस फूलना व रेशेदार कफ निकलना। अस्थमा रोगी को कभी भी अटैक पड़ सकते हैं और यह अचानक होता है। इस दौरान व्यक्ति की सांस नलिकाएं सिकुड़ती हैं व अंगों को ऑक्सीजन मिलनी कम हो जाती है। ऐसे में कई बार रोगी की स्थिति गंभीर भी हो जाती है जिसे फौरन इलाज से नियंत्रित किया जा सकता है।

इन लोगों को खतरा
फैमिली हिस्ट्री अस्थमा का खतरा बढ़ाती है। किसी विशेष पदार्थ से एलर्जी, धूम्रपान करने वाले व पैसिव स्मोकिंग (उनके आसपास रहने वाले) के शिकार, कारखानों व कैमिकल फैक्ट्री में काम करने वालों को खतरा ज्यादा रहता है।

इन्हेलर का प्रयोग
अस्थमा में डॉक्टर रोगी को इन्हेलर प्रयोग करने की सलाह देते हैं। यह एक ऐसी मेडिकल डिवाइस है जिससे दवा बहुत ही कम मात्रा में फेफड़ों और सांस की नली पर अपना प्रभाव दिखाती है। यह दवा सांस की नली की सिकुडऩ दूर कर इसे चौड़ा करने का काम करती है जिससे शरीर में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में पहुंच पाती है और सांस लेते समय कोई तकलीफ नहीं होती।


कब करते हैं प्रयोग : रोग के दौरान या अटैक आने पर इसका प्रयोग किया जाता है। यदि व्यक्ति को एलर्जी हो तो इन्हेलर के अलावा इसकी दवाएं दी जाती हैं।


क्यों है फायदेमंद : इन्हेलर से शरीर में जाने वाली दवा सीधे फेफड़ों पर असर करती है जिससे फौरन आराम मिलता है। इन्हेलर से दवा लेने पर दुष्प्रभाव नहीं होता। गंभीर स्थिति में डॉक्टर इन्हेलर के अलावा अन्य दवाएं भी देते हैं।

ये हैं वजह
मानसिक तनाव या डर।
एलर्जी के साथ खांसी, जुकाम व नजला रोग अधिक समय तक बने रहने पर।
श्वास नलिका में धूल व
सर्दी लगने से।
धूम्रपान करने या ऐसे लोगों के साथ रहने से।
जानवरों की त्वचा, बाल, पंख या रोएं।
एकदम से सर्दी या गर्मी आने पर।
फैमिली हिस्ट्री।
घर में मौजूद धूल, मिट्टी, डस्ट माइट्स और अन्य छोटे-छोटे कीटाणु।

ये जांचें प्रमुख
स्पायरोमेट्री, पीक फ्लोमेट्री, चेस्ट एक्सरे, एलर्जी टेस्ट और स्किन प्रिक टेस्ट से अस्थमा रोग का पता लगाया जाता है। कई बार डॉक्टर सांस की गडग़ड़ाहट आदि सुनकर भी रोग का निरीक्षण करते हैं।

पीडि़त का रखें खयाल
रोगी धूम्रपान न करें व तंबाकू के सेवन से बचें।
धूल, धुंए और प्रदूषण वाली जगहों से दूर रहें।
इस रोग से पीडि़त लोग तनाव और लड़ाई-झगड़ों से बचें। विपरीत परिस्थिति में घरवालों की सहायता के अलावा डॉक्टर से अवश्य संपर्क करना चाहिए।
गद्दों, तकियों और चादर की नियमित साफ-सफाई का खयाल रखें। पालतू जानवरों को हर हफ्ते नहलाएं और उन्हें बिस्तर, सोफे या कुर्सी पर न बैठने दें।
अस्थमा से प्रभावित बच्चों को उनकी उम्र वाले साथियों के साथ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने दें।
फर वाले तकिए के कवर या खिलौनों का प्रयोग न करें।
दोपहर के समय जब परागकणों की संख्या बढ़ जाती है तो बाहर जाने से बचें।
अस्थमा से प्रभावित व्यक्तिसे अलग तरह का व्यवहार न करें।
अटैक आने पर घबराएं नहीं व फौरन विशेषज्ञ से संपर्क कर सलाह लें।