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‘किरणों के तिनके अम्बर से चुन के अंगना में फिर आजा रे…

ओ री चिरैया, नन्हीं सी चिडिय़ा, अंगना में फिर आजा रे..., किरणों के तिनके अम्बर से चुन के अंगना में फिर आजा रे...।

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डूंगरपुर.

ओ री चिरैया, नन्हीं सी चिडिय़ा, अंगना में फिर आजा रे..., किरणों के तिनके अम्बर से चुन के अंगना में फिर आजा रे...। यह पंक्तियां गूंजते ही सहज ही मन शांतचित्त में डूब जाता है। कभी हर घर के आंगन एवं घर की दीवारों पर टंकी लकड़ी की तस्वीरों और दीवार घडिय़ों के पीछे दिन-भर ची-ची की अपनी मधुर स्वर से पूरे घर को सर पर उठा देने वाली हमारी नन्हीं और प्यारी सी दुलारी चिडिय़ा गौरैया अब हमसे रूठ गई हैं। तेजी से बदलती महानगरीय संस्कृति एवं ईट-सीमेंट और कंकरीट के घरों ने घर के इस स्थायी और सबसे अधिक फूर्तीले और चंचल सदस्य को हमसे दूर कर दिया है। तेजी से घटती इस पक्षी को देखते हुए हर वर्ष 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। विश्व गौरैया दिवस पर इस चंचल और प्यारे गौरैया पक्षी पर पत्रिका की प्रस्तुत है यह खास पेशकश...

यह है अपनी गौरैया की पहचान
गौरैया एक घरेलू चिडिय़ा है, जो यूरोप और एशिया में तो सामान्य रूप से हर जगह पाई जाती है। पर, यह हमारे भारत की भी प्रमुख चिडिय़ां है। लोग जहां-जहां भी घर बनाते हैं। यह गौरैया अपने जोड़े के साथ रहने आती ही हैं। कद-काठी पर बात करें, तो यह एक छोटी सी चिडिय़ा है। हल्के भूरे रंग या सफेद रंग की इस चिडिय़ां के छोटे-छोटे पंख होते हैं और चोंच एवं पैरों का रंग भी हल्का पीला होता है। नर गौरैया के गले के पास काले धब्बे होते हैं तथा इसकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर तक होती है। नर गौरैया के सिर का ऊपरी-नीचे का भाग का रंग भूरा होता है। गला, चोंच और आंखों पर काला रंग होता है। जबकि, मादा चिडिय़ा के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होता। लोग इन्हें चिड़ा-चिडिय़ा भी कहते हैं। इसे सामान्य भाषा में घरेलू चिडिय़ा कहा जाता है। इस चिडिय़ा की सबसे बड़ी खासिख्यत यह है कि यह जहां मनुष्य रहते हैं, उनके आसपास ही रहना पसंद करती है। कई घरों में ईटों के टूटे हिस्सों, तो रोशनदान, तो तस्वीरों-घडिय़ों, पंखों के कप में यह अपने घौसलें बना देती है। इस पक्षी को 'हाउस स्पेरोÓ भी कहा जाता है।

ची-ची की चहचहाट अब सुनाई नहीं देती
कभी घर-घर की पहचान हुआ करती गौरैया पक्षी के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा मेें पर्याप्त कदम नहीं उठाए जाने की वजह से अधिकांश घरों से अब ची-ची की मधुर चहचहाट की गूंज सुनाई नहीं देती है। एक समय था जब यह पक्षी घर की दीवारों पर लगे कांच पर चोंच मारकर टक-टक किया करती थी, तो कई घरों में पानी के जमे छोटे पोखरों में पानी में खेला करती थी। पर, अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। हालात यह है कि कई घरों में तो यह पक्षी दिखाई ही नहीं देता है। पक्षीविदें की माने तो गौरैया पक्षी की आबादी में 6५ से 80 फीसदी तक कमी आई है।

यह है कम होने के कारण
. पक्के घरों में पक्षियों के लिए कौने आदि नहीं रखे जाते हैं।
. अब घरों में चुग्गा (पक्षियों के लिए दाना) डालने की परम्परा लगभग बंद हो गई है।
. खेतों में किट नाशकों का इस्तेमाल बढ़ गया है। यह पक्षी फसलों पर लगने वाले कीट आदि खाती है।
. घरों में जीव-जन्तु के लिए पानी के पात्र रखना बंद कर दिया है।

पर्यावरण एवं धर्म दोनों लिहाज से है महत्वपूर्ण
गौरैया पक्षी पर्यावरण को संतुलन को बनाए रखने में सहायक है। वहीं, यह विशुद्ध रूप से पर्यावरण की पहचान है। धर्म के लिहाज से भी यह पक्षी काफी महत्वपूर्ण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह चिडिय़ा जिस घर या आंगन में रहती है वहां सुख-समृद्धि का वास होता है। हिन्दू धर्म में पक्षियों को देवता और पितृ माना गया है। इन पक्षी की चहचहाहट शुभ ध्वनि मानी जाती है।

डूंगरपुर में इस शख्स से बना दिया घर को ही चिडिय़ाघर
गौरैया पक्षी के साथ ही सभी पक्षियों के प्रति अपने अटूट प्रेम के चलते डूंगरपुर के सदर थाना क्षेत्र के पास रहने वाले जल संसाधन विभाग के पूर्व सहायक लेखाधिकारी महेश चौबीसा नाम के शख्स ने अपने पूरे घर को ही चिडिय़ाघर बना दिया है। घर में जगह-जगह पक्षियों के मानवकृत घौसले लगा रखे हैं, तो पक्षियों के लिए अप्राकृतिक जलस्त्रोत बना दिए हैं। पक्षियों के लिए दाना-पात्र, तो पेड़-पौधों डालियों से पक्षियों के पुनर्वास के प्रयास किए गए हैं। उनका कहना है कि पहले एक परम्परा देखने को मिलती थी कि हम मंदिर जाने के दौरान एक मुट्ठी अनाज लेकर जाते थे और उसे मंदिर के बाहर खाली चौगान आदि में चुग्गे के लिए डाल देते थे। यह परम्परा अब लुप्त हो गई है। इसको जीवित करना जरूरी है।

परिवार की है पहचान
. गौरैया के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समन्वित एवं सामूहिक प्रयास करने की जरूरत है। यह पक्षी नहीं परिवार का सदस्य हैं। इनके लिए अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं है। घर में पौधरोपण कर चुग्गा एवं पानी के पात्र रख लिए जाए, तो भी बहुत है।
- रुपेश भावसार, पक्षीविद्

'कही खो न जाए घर आंगन की पहचानÓ
- गेस्ट राइटर
डूंगरपुर. आज वर्ड स्पेरो डे है। अर्थात विश्व गौरैया दिवस। गौरैया हमारे गांव, शहर व देश दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं। हम इसे घरेलु चिडिय़ा (सकली) भी कहते हैं। वहीं, गोरैया है, जो किसी समय सुबह के जागरण का आगाज करती थी। प्रात:काल इनके चहकने की अनोखी प्रकृति होती है। इसकी यहीं चहचहाहट और अठखेलियां हमारे घर आंगन को जीवंत वातावरण प्रदान करती है। गौरैया एक घरेलु और सामाजिक पक्षी है। मनुष्य से सदा इसका गहरा नाता रहा है। पर, अब परिस्थितियां बदल रही है। इसका मुख्य कारण मनुष्य की जीवन शैली व मूल्यों में आ रहा है परिवर्तन है। बात सत्य पर, आश्चर्यजनक है कि जो पक्षी करीब दस हजार वर्ष से मनुष्य का सबसे बड़ा साथी रहा है। वह अब उसे छोड़कर जा रहा है। अब घरों में मोहल्लों व गांव शहर में गोरैया की वह तादाद नही रही, जो कुछ दशकों पूर्व देखी जाती थी। कारण स्पष्ट है इनका पर्यावास, आवास, आहार सब प्रभावित हो रहा है। पहले लोगों में पशुपक्षियों के प्रति संवेदना थी। घर आंगन में इसके अतिक्रमण को स्वीकार कर लिया जाता था। पर, स्थितियां बदल गई हैं। अब बहुमंजिली इमारत बन गई हैं। लोग-बाग खाद्यान पैकिंग में लाने लगे हैं। आंगन या छत पर अन्न सुखाया ही नहीं जाता, तो गौरैया को दाना कहां से मिलेगा। खेत-खलिहानों में रसायनिक उर्वरकों किटनाशकों का अंधाधुध प्रयोग भी इनके जीवन के लिए घातक साबित हो रहा है। जबकि, यह पक्षी किसान की मित्र है। यह खरपतवारों के बीज एवं कीट इल्लियां खा जाती है। इस पक्षी के बारे में डिगंल साहित्यकार ठाकुर भैरवसिंह चूण्ड़ावत के कथनानुसार इस पक्षी का धूल में नहाना वर्षारंभ का ***** है। पर्यावरण प्रदूषण एवं मोबाइल टॉवर विकिरण भ्ज्ञी इस जीव को नुकसान पहुंचा रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस छोटे से जीव को बचाने के लिए जनचेतना और जन सहभागिता बहुत जरूरी है। इन बेजुबान परीदों के लिए दाना-पानी के पात्र और आवास मुहैया कराना होगा। तभी हम हमारी आने वाली संस्कृति को संस्कृति के संवाहक इस पक्षी की मधुर चहचहाहट दे सकेंगे।

- वीरेन्द्रसिंह बेडसा पूर्व मानव वन्य जीव प्रतिपालक