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Maha Shivratri 2024 : राजस्थान में एक ऐसा मंदिर… जहां खंडित शिवलिंग की होती है बारह मास पूजा

Maha Shivratri 2024 : राजस्थान के दक्षिणांचल में अवस्थित वागड़ का डूंगरपुर जिले के कण-कण में भगवान शंकर का वास माना जाता है। यहां स्वयंभू शिवलिंग है, तो यहां खण्डित शिवलिंग भी हैं।

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Maha Shivratri 2024 : डूंगरपुर। राजस्थान के दक्षिणांचल में अवस्थित वागड़ का डूंगरपुर जिले के कण-कण में भगवान शंकर का वास माना जाता है। डूंगर नी नगरी और गिरीपुर के नाम से विख्यात इस धर्म नगरी में प्रकृति स्वयं ही जगह-जगह डूंगरियों से स्वयंभू शिवलिंग का दर्शन करवाती है। शिव और शक्ति की इस नगरी में हर डगर पर बड़े-बड़े शिवालय हैं, जहां वर्ष पर्यन्त धर्म की भगीरथी सहज बहती रहती हैं। यहां स्वयंभू शिवलिंग है, तो यहां खण्डित शिवलिंग भी हैं। यहां नंदी पर पूरा शिव परिवार विराजता है, तो यहां चारों तरफ पानी से घिरे बड़े शिव मंदिर सहज ही भक्तों को अपलक निहारने पर मजबूर कर देते हैं। आईये महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर जानते है डूंगरपुर जिले के ख्यातनाम शिव मंदिरों के बारे में।

सोम, माही और जाखम के त्रिवेणी संगम स्थल पर बेणेश्वर शिवालय है। यहां पर करीब आधे फूट ऊंचे स्वयंभू शिवलिंग है और यह खंडित है। खास बात ये है कि राजस्थान का यह पहला खण्डित शिवलिंग है, जिसकी बारह मास आराधना होती है। इस शिवलिंग का उल्लेख स्कन्द पुराण में भी मिलता है। राजा इन्द्रद्युम्न ने चिरस्थायी कीर्ति के उद्देश्य से महिसागर संगम पर अविचल शिवलिंग की स्थापना की थी। कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में बेणेश्वर तीर्थ पर मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 1605-1637 के बीच डूंगरपुर के महारावल आसकरण द्वारा कराए जाने का उल्लेख भी है।

इस शिवालय के जीर्ण-शीर्ण हो जाने पर माडा के ठाकुर वीरसिंह सोलंकी ने विक्रम संवत 1826 में इस मंदिर का जीर्णोद्वार कराकर माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को गुरुवार के दिन शिवलिंग, पार्वती, गणपति एवं नंदी की प्रतिष्ठा भी करवाई थी। महारावल लक्ष्मणसिंह ने भी राजगौर भोगीलाल पुरोहित की देखरेख में खंडित इस शिवलिंग के बजाय दूसरा शिवलिंग स्थापित करने का प्रयास किया था। लेकिन, शिवलिंग को काफी गहराई तक खोदने के बाद भी उसकी जड़ (छोर) नहीं मिल पाने कारण शिल्पियों एवं पंडितों ने तब महारावल को बताया यह महाशिवलिंग है। इसे विसर्जित नहीं किया जा सकता है।



शहर में स्थित हजारेश्वर शिवालय है। इसका निर्माण संवत् 1836 में माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन तत्कालीन महारावल शिवसिंह की रानी फूल कुंवरजी ने करवाया था। प्रारंभ में इस शिवालय को फूलेश्वर महादेव मंदिर के रूप में जाना जाता था, लेकिन बाद में इस शिवालय के सभा मण्डप में 108 छोटे-छोटे शिवलिंग का एक बाण प्रतिष्ठापित करने पर यह हजारेश्वर शिवालय के रूप में जाने लगा। सभा मण्डप में भगवान विष्णु की एक कलात्मक प्रतिमा स्थापित है, जो गरुड पर सवार है। लक्ष्मीजी गोद में बैठी हुई है। शिवालय के सभा मण्डप में मुख्य चौकी पर मुख्य शिवलिंग के चारों ओर 108 छोटे-छोटे शिवलिंग हैं तथा बीच में पांच शिवलिंग और हैं। उसी के निकट एक अन्य छोटी चौकी पर मुख्य शिवलिंग सहित 35 छोटे-छोटे शिवलिंग हैं। सभा मण्डप के चारों ओर चार स्तम्भों पर अलग-अलग चार शिवलिंग हैं। मध्य में एक स्तम्भ पर 11 शिवलिंग हैं। सभा मण्डप में छोटे-बडे तीन नन्दिश्वर भी प्रतिष्ठापित हैं। हजारेश्वर शिवालय सभा मण्डप के 18 स्तम्भों पर छह-छह कलात्माक प्रतिमाएं उकेरी हैं, जो शिल्पकला का बेजोड नमूना है। शिवालय के गर्भगृह में एक बड़ा शिवलिंग प्रतिष्ठापित है।

जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर सोम नदी के तट पर देवसोमनाथ मंदिर है। मंदिर निर्माण का कोई शिलालेख तो प्राप्त नहीं है। पर, बताया जाता है कि विक्रम संवत 12वीं शताब्दी के आसपास बना हुआ है। मंदिर श्वेत पाषाण का बना हुआ है। चारों ओर कोट हैं। इसके तीन द्वार हैं, जो पूर्व, उत्तर और दक्षिण में हैं। प्रत्येक द्वार पर दो-दो मंजिला झरोखे हैं और गर्भगृह पर ऊंचा शिखर बना हुआ है। गर्भगृह के सामने आठ विशाल स्तम्भों का सभा मण्डप बना हुआ है। मंदिर के सभा मण्डप से निज मंदिर में प्रवेश करने के समय आठ सीढ़ी नीचे उतरने पर शिवलिंग आता है। मंदिर के पीछे एक कुण्ड बना हुआ है। इसमें से शिवालय में जल के लिए संगमरमर की नाली स्तम्भों पर बनी हुई थी, फिलहाल यह क्षतिग्रस्त है। मंदिर के निर्माण में कहीं भी ईट, मिट्टी, गारे या चूने का प्रयोग नजर नहीं आता है।

आसपुर में सोम नदी के तट पर स्थित ईश्वर महादेव मंदिर गोल है। किवंदति है कि विक्रम संवत पांचवी शताब्दी में ईशरी देवी कंसारा परम भक्त थी। वह प्रतिदिन सोम नदी के उस पार बिलेश्वर महादेव के दर्शन कर अन्नजल ग्रहण करती थी। श्रावण मास में सोमनदी में बाढ़ आने से दो दिन तक नदी ने उतार नहीं दिया। लेकिन, ईशरी देवी पानी उतरने का इंतजार करती रही। इससे प्रसन्न होकर शिव ने उसे स्वप्न दिया कि तुम जहां, बैठकर इंतजार कर रही हो, वहीं मैं हूं। पूजा करो। ईशरी देवी ने वहां खुदाई कर स्वयंभू शिवलिंग का अभिषेक किया। ईशरी देवी ने मंदिर करवाया। 1986 से प्रतिवर्ष यहां शिवरात्रि पर मेला भरता है।

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सारणेश्वर शिवालय : घाटी दरवाजे से आगे सारणेश्वर शिवालय हैं। विक्रम सवंत 1730 आश्विन सूदी पांचम को तत्कालीन महारावल जसवंतसिंह ने निर्माण करवाया था। शिवालय परिसर में मुख्य शिवालय सहित छोटे-बडे़ कुल पांच मंदिर हैं। मुख्य शिवालय के सभा मण्डप में तीन नन्दिश्वर स्थापित हैं और रिद्धी-सिद्धी गणपति की एक प्रतिमा भी हैं। गर्भगृह में एक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है, जिसके ठीक सामने पार्वती जी की दो प्रतिमा हैं। शिवालय का देवस्थान विभाग के आर्थिक सहयोग से सन् 1974 में जीर्णोद्वार हुआ।

वनेश्वर शिवालय : उदयविलास महल से कुछ ही दूरी पर मुख्य सड़क के निकट प्राचीन वनेश्वर शिवालय है। सभा मण्डप 18 स्तम्भों पर टीका हुआ है। इनके चारों ओर कलात्मक झरोखे बने हुए हैं। सभा मण्डप में दो नंदिश्वर हैं। गर्भगृह में बड़ा शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इसके पीछे पार्वती, ब्रह्माजी एवं भगवान गणेश की कलात्मक प्रतिमाएं हैं। सभा मण्डप में हनुमानजी की प्रतिमा भी है। शिवालय के ठीक सामने द्वारिकाधीश का विशाल मंदिर है। मंदिर परिसर में ही महालक्ष्मी माता का मंदिर भी है।

नीलकंठ महादेव का प्राचीन मंदिर : भासौर में नीलकंठ महादेव का प्राचीन मंदिर है। किवंदिती है कि प्राचीन समय में खुदाई में यह शिवलिंग निकला था। इसके बाद महादेव ने स्वप्न में आकर इसे स्थापित करने की आज्ञा दी थी। बताया जाता है कि 1960 में मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में मां पार्वती, गणेशांबिका, पवनपुत्र हनुमान, बटुक भैरव, कृष्णपिंगाक्ष गणपति, नंदी महाराज की प्रतिमाएं भी स्थापित है।

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