
दुर्ग . कहा जाता है कि अगर किसी कलाकार को जिंदा रहते ही मारना है तो उसे मंच से दूर कर दिया जाए। यही हाल हमारे जिले के कला पथक कलाकारों का है। समाज एंव कल्याण विभाग ने आधा दर्जन कलाकारों को मंच व नुक्कड़ से न केवल दूर कर दिया है बल्कि कलाकारी बंद कराकर उनसे बाबूगिरी करवाया जा रहा है। समाज एंव कल्याण विभाग ने कलाकारों की भर्ती इसिलिए की थी कि वे अपनी कला के माध्यम से गांव गांव में शासन की योजनाओं का प्रचार प्रसार करे।
गीत, गम्मत व नाटक के माध्यम से लोगों में स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा का अलख जगाए। कलापथक के आधा दर्जन कलाकार अपनी कला को ही लगभग भलने लगे हैं। शहर के नुक्कड़ या गांव के चौपाल में कला का जौहार दिखाते शासकीय योजनाओं का प्रचार प्रसार करते थकते नहीं थे वे अब दफ्तर की कुर्सी में बैठ घुटन सा महसूस कर रहे हैं पृथक राज्य बनने के बाद सामाज एंव कल्याण विभाग कला पथक के कालाकारों से बाबूगिरी का काम ले रहा है।
दिन भर कार्यालय में काम करने के बाद कलाकार रियाज नहीं कर पाते और अपने कला से दूर होते जा रहे हैं। जबकि कला पथक के कलाकार अपने अपने विधा में परागंत है। कोई अभिनय में डिप्लोमा है तो किसी के पास वादन में एमए की डिग्री है।
देश के प्रथम प्रधानमंत्री के निर्देश पर दल का गठन
कला पत्थक के कलाकार समाज एवं कल्याण विभाग के नियमित कर्मचारी हैं। उनका मूल कार्य गांव गांव भ्रमण करना और वहां के समस्याओं की जानकारी लेना। समस्या को शासन की योजनाओं से जोड़ते हुए नाटक व गम्मत, गीत के माध्यम से लोगों को जानकारी देना है।
देश को आजादी मिलने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु ने कला पथक का गठित करने के निर्देश दिए थे। उनकी मंशा थी कि अशिक्षित समाज में ये कलाकर लोगों को गीत संगीत व लोककलाओं के माध्यम से जागरूक करेंगे। सामाजिक बुराईयों से दूर रहने के लिए प्रेरित करेंगे। शासन का कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के बारे में बताएंगे।
तब अपनी बेबेसी पर रो पड़े कलाकार
कुछ माह पहले युवा आयोग ने जिले के कलाकारों को रायपुर कार्यशाला में आमंत्रित किया। कलाकारों को शासन की योजनाओं के लिए नाटक तैयार करना था। कार्यशाला पहुंचे कलाकारों की स्थिति ऐसी थी कि वे मूकबधिर की तरह खड़े होकर एक दूसरे का चेहरे को देखने लगे। वाद्य यंत्र में न तो हाथ चल रहा था और न ही कलाकार की आवाज निकल रही थी।
निरंतर अभ्यास न करने और पंद्रह वर्ष से मंच से दूर रहने के कारण अपनी स्थिति को देख कलाकार डबडबाई आंखे लेकर वापस लौट आए थे। उपसंचालक समाज एवं कल्याण विभाग धर्मेंद साहू ने बताया कि हमारे पास कर्मचारियों का अभाव है। इसलिए कलापथक के कलाकारों को अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है।
अविभाजित मध्यप्रदेश में जीते कई ईनाम
बाबूगिरी करने वाले समाज एवं कल्याण विभाग के कलाकारों का एक समय प्रदेश में नाम था। प्रदेश स्तर पर होने वाले कार्यक्रम में दुर्ग के कला पत्थक के कलाकारों को नाम से जाना जाता था। वे लगातार कई साल तक प्रथम पुरस्कार जीतते रहे। शासन की योजनाओं का प्रचार प्रसार करने शासन बड़ी राशि हर साल खर्च कर रह है। एनजीओ के माध्यम से क्षेत्रीय कलाकारों की टोली को हायर की जा रही है। जबकि विभाग के अपने कलाकार वर्तमान में उपेक्षित है।
Published on:
05 Dec 2017 11:10 am
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