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500 रुपए के गोबर से बनाई जा सकती है 18 यूनिट तक बिजली, 6 घंटे जलाए जा सकेंगे 10 वाट के 250 एलईडी बल्ब

छत्तीसगढ़ के गौठानों से अच्छी खबर आ रही है। यहां गौठानों से निकलने वाले गोबर से बिजली उत्पादन शुरू किया गया है। जानकारों की मानें तो महज 500 रुपए के 250 किलो गोबर से 15 से 18 किलोवाट (यूनिट) तक बिजली बनाई जा सकती है। इससे 10 वाट के 200 से 250 एलईडी कम से कम 6 घंटे तक जलाए जा सकते हैं।

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प्रायोगिक तौर पर पाटन के सिकोला के गौठान में गोबर से बिजली बनाई जा रही

प्रायोगिक तौर पर पाटन के सिकोला के गौठान में गोबर से बिजली बनाई जा रही

दुर्ग. जिले में प्रायोगिक तौर पर पाटन के सिकोला के गौठान में गोबर से बिजली बनाई जा रही हैं। राज्य शासन की पहल पर यहां 10 क्यूबिक मीटर का टैंक स्थापित किया गया है। यहां फिलहाल 2.8 केवीए के जेनरेटर से बिजली उत्पादन की जा रही है। इस यूनिट में हर दिन 250 किलो गोबर का इस्तेमाल हो रहा है। इससे 6 घंटे तक 2 किलोवाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल फिलहाल गौठान के अलावा पांच घऱ को रौशन करने के साथ पांच घरों के रसोई को गैस देने का लिए किया जा रहा है।


ऐसे समझे गोबर से बिजली की गणित को
0 1 सामान्य मवेशी से 10 किलो गोबर हर दिन मिलता है।
0 10 क्यूबिक मीटर टैंक के लिए 250 किलो गोबर और इतने ही पानी की जरूरत होती है।
0 25 मवेशियों से 250 किलो गोबर यानि 10 क्यूबिक टैंक के लिए गोबर की जरूरत पूरी हो सकती है।
0 1 क्यूबिक मीटर गोबर गैस से आदर्श स्थिति औसत 1.8 किलोवाट (यूनिट) बिजली बनती है।
0 10 क्यूबिक मीटर के प्लांट में आदर्श स्थिति में 18 यूनिट बिजली बनाई जा सकती है।
0 सामान्य टैंक से औसत 15 यूनिट बिजली का पैदावार माना जा सकता है।
0 हर घंटे 200 एलईडी से 2 यूनिट के हिसाब से 6 घंटे में न्यूनतम 12 से 15 यूनिट (लाइन लॉस के साथ) बिजली खर्च होगी।


बड़े यूनिट से ज्यादा फायदा
फिलहाल गौठानों में प्रायोगिक तौर पर महज 10 क्यूबिक मीटर के छोटे यूनिट लगाए गए हैं। जानकारों की मानें तो बड़े गौठानों में जहां 500 से 1000 मवेशी रखे जा रहे हैं, वहां 200 से 300 किलोवाट उत्पादन के यूनिट लगाए जा सकते हैं। इससे गौठानों को ज्यादा फायदा होगा और यूनिट का संचालन भी बेहतर हो सकेगा।


वेस्ट से भी बेस्ट क्लालिटी का कंपोस्ट
यूनिट के वेस्ट के रूप में मिलने वाले स्लरी से भी बेहतर क्वालिटी का वर्मी कंपोस्ट बनाया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक इससे मिथेन गैस पहले ही अलग हो चुका होता है, इसलिए इसे डंप करके रखने की जरूरत नहीं पड़ती और तत्काल वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है। बता दे कि गौठानों में गोबर खरीदी की व्यवस्था वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए ही किया गया है।


प्रयास बेहतर, उद्यमिता से जोड़ें
गोबर से बिजली तैयार करने के विकल्पों पर कई साल से अध्ययन कर रहे अभ्यूदय संस्थान अछोटी के संकेत ठाकुर बताते हैं कि उनके संस्थान में 20 साल पहले से ही इस प्रक्रिया से बिजली तैयार की जा रही है। शासन का प्रयास बेहतर व सराहनीय है। इसे गौठानों में वेलफेयर की जगह उद्यमिता से जोड़ दिया जाए तो बेहतर परिणाम आएगा। छोटे प्रोजेक्ट की जगह कम से कम 200 से 300 यूनिट क्षमता के प्लांट लगाए तो बेहतर होगा।