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दो साल की कड़ी मेहनत और काउंसिलिंग के तमाम राउंड्स की भाग-दौड़ के बाद आखिरकार मेरी मेहनत रंग लाई और साल 2013 में मुझे मुंबई के इस नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला। मैं तो खुश थी ही, लेकिन मेरा परिवार मुझसे कहीं ज्यादा खुश था, आखिर मैं परिवार की पहली लडक़ी थी, जिसने इतने बड़े कॉलेज में एडमिशन पाने की उपलब्धि हासिल की थी। एडमिशन से पहले के दो साल मेरे लिए बहुत कठिन रहे थे - मुझे नहीं याद कि इन दो सालों में मैंने कोई शादी या बर्थडे पार्टी अटैंड की हो, या फिर मेरे कॉमर्स और आर्ट्स वाले फ्रेंड्स की तरह गेट टुगेदर किया हो। मेरी स्कूल फेयरवेल पार्टी में जाने के लिए भी मुझे केवल 1 घंटे की मोहलत मिली थी, लेकिन दो सालों की इस कड़ी मेहनत का मीठा फल था मेरा एडमिशन।
कॉलेज शुरू होने से एक दिन पहले मम्मी पापा मुझे कॉलेज होस्टल तक छोडऩे आए थे। उन्हें विदा कर पहली बार यह अहसास हो रहा था कि अब मैं उनके सुरक्षा कवच से बाहर इस दुनिया में कदम रख चुकी हूं और यहां से आगे की राह खुद ही तय करनी है। कॉलेज का पहला दिन था, मैं बहुत उत्सुक थी, लेकिन सच पूछें तो मन में एक डर था, कहीं रैगिंग हो गई तो। हमारा कॉलेज को-एड था, इसलिए लड़कियों से तो नहीं, लेकिन मैं लडक़ों से बहुत डरी हुई थी। सहमे हुए कदमों के साथ मैंने कॉलेज कैम्पस में एंटर किया। मैं कुछ कदम चली ही थी कि सामने से लडक़ों व लड़कियों का एक ग्रुप आता दिखा।
मैंने मन में सोचा, बेटा तैयार हो जाओ आज तो तुम्हारी रैगिंग पक्की। मन में रैगिंग का डर इतना गहरा था कि मेरे कदम वहीं रुक गए, लेकिन सीनियर्स का वह ग्रुप मेरी ओर बढ़ा आ रहा था। मैं अगला कदम भरने की हिम्मत ही जुटा रही थी कि वे सब मेरे सामने आ कर खड़े हो गए। उनमें से एक ने मुझसे पूछा - न्यू एडमिशन? मैंने हां में सिर हिला दिया। मेरा डर मेरे चेहरे पर साफ दिख रहा था, माथे से पसीना फिसल कर गाल तक आ चुका था। मैंने पसीना पोंछने के लिए हाथ उठाया कि इतने में दूसरा सवाल आया - कौनसा स्ट्रीम? मैंने फिर सहमी हुई आवाज में जवाब दिया कम्प्यूटर साइंस। मैं बचपन से ही पढ़ाई में तेज थी और स्कूल में हैड गर्ल भी रह चुकी थी, लेकिन यहां इन सीनियर्स की टोली के सामने मेरी सिट्टी पिट्टी गुम थी।
मेरे मन में तरह तरह के सवाल उठ रहे थे, अब क्या होगा, क्या ये लोग मुझे गाना गाने को कहेंगे, या फिर मुझे किसी टीचर को तंग करने का टास्क दिया जाएगा, कहीं ये लोग मेरे साथ कोई बद्तमीजी तो नहीं करेगें। मैं ये सब सोच ही रही थी कि सीनियर्स की टोली में से एक लडक़ी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं और डर गई। इसके बाद जो होने वाला था, यकीनन वह मेरी सोच से परे था। मेरी सीनियर ने बोलना शुरू किया - घबराओ मत, हम लोग तुम्हारी रैगिंग लेने नहीं आए हैं, दरअसल हमारा ग्रुप तुम जैसे न्यू कमर्स को रैगिंग से बचाने का काम करता है। यह स्पेशल ग्रुप है, जिसका गठन हम स्टूडेंट्स ने ही न्यू कमर्स की सेफ्टी के लिए किया है। हम समझते हैं कि आप पहली बार घर और माता पिता के संरक्षण से बाहर निकले हैं, हमारा फर्ज है कि हम आप सब न्यू कमर्स को कॉलेज में सुरक्षित माहौल दें।
यह सुनते ही मेरी आंखों से आंसू बह निकले, मैं तो न जाने क्या क्या सोच बैठी थी, लेकिन यकीनन सीनियर्स के इस ग्रुप ने मुझमें हौंसला भर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने मुझे मेरी क्लास तक पहुंचने में भी मदद की और अपने व्हॉट्सएप ग्रुप में भी मुझे एड किया। उन्होंने मुझे यह भी कहा कि अगर कोई मुझे कॉलेज में परेशान करने या मेरे साथ रैगिंग करने की कोशिश करे तो मैं केवल हैल्प लिख कर इस व्हॉट्सएप ग्रुप में सेंड कर दूं और हो सके तो अपनी लोकेशन डाल दूं। मेरी मदद के लिए कोई न कोई जरूर समय पर पहुंच जाएगा। उस दिन के बाद मैंने बेधडक़ उस कॉलेज में चार साल बिताए और अपनी इंजीनियरिंग पूरी की। हालांकि इसके बाद मैं भी उनके इस ग्रुप में शामिल हो गई और अपने जूनियर्स को सपोर्ट करने में जुट गई।
सच, अगर किसी नई जगह कुछ अच्छे लोगों का साथ मिल जाए तो जीवन आसान बन जाता है। हालांकि यह समझना बहुत जरूरी है कि जिस तरह आपको कुछ अच्छे लोग मिले उसी तरह आपको भी अच्छा बनना चाहिए ताकि आपकी वजह से किसी और का भी जीवन कुछ हद तक आसान हो सके।
नोट : सुरक्षा कारणों से स्टूडेंट और कॉलेज का नाम नहीं छापा गया है।
Published on:
25 Jun 2018 02:49 pm
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