
देश के आम चुनाव और प्रदेश के विधानसभा चुनाव कई मायने में ऐतिहासिक रहे। पार्टियों का विघटन, विलय और चुनावी ऊंट का कभी एक करवट बैठना तो अगली बार दूसरी... इनसे लोकतंत्र का भाल चमकता चला गया। वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसे ही रहे। जनता पार्टी को बुरी तरह परास्त कर कांग्रेस ने केंद्र सरकार के रूप में वापसी होती है। इसका असर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर भी पड़ा और यहां भी कांग्रेस को बहुमत मिल गया। उसे ऐतिहासिक रूप से उस समय तक के चुनावों में सबसे अधिक 320 सीटों में से 246 सीटें मिलीं। लोकसभा चुनाव के बाद जनता पार्टी भी टूट गई। उसका महत्वपूर्ण धड़ा जनसंघ नए नाम ‘‘भारतीय जनता पार्टी’’के साथ पुर्नगठित हुआ। उस समय भाजपा को विधानसभा चुनाव में 60 सीटें मिलीं।
लहर के बाद भी कांग्रेस केकई बड़े नेता चुनाव हार गए
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल कांग्रेस से बाहर होने के कारण चुनाव नहीं लड़े, जबकि पार्टी के अधिकांश बड़े नेता चुनाव जीत गए थे। इनमें अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह, श्रीनिवास तिवारी, रामकिशोर शुक्ल, कृष्णपाल सिंह, तेजलाल टेंभरे, वेदराम, दुर्गादास सूर्यवंशी, विमला वर्मा आदि शामिल थे। पूर्व राज परिवारों से रश्मि देवी सिंह (खैरागढ़), देवेंद्र कुमारी सिंहदेव (बैकुंठपुर), सुरेंद्र कुमार सिंह (लैलूंगा), कमला देवी सिंह (सरिया), लालकीर्ति कुमार सिंह (तानाखार), धीरेंद्र सिंह (अकलतरा), सुरेंद्र बहादुर सिंह (सक्ती), महेंद्र बहादुर सिंह(बसना), यादवेंद्र सिंह (बिजावर) आदि।
1972 , 1977 और 1980 में ऐसे बदलती गई तस्वीर
वर्ष 1972 के विधानसभा चुनाव के बाद यह लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव था, जो लहर का चुनाव था। इसके चलते चुनाव परिणाम एक तरफा उस पार्टी के पक्ष में जाते रहे, जिसके पक्ष में चुनावी लहर थी। इन तीन चुनावों ने प्रदेश की चुनावी राजनीति को दो दलीय बनाया दिया और कांग्रेस-भाजपा के अलावा अन्य राजनीतिक दलों की चुनावों में मजबूत स्थिति नहीं रही। लिहाजा पूरा चुनाव परिणाम इन्हीं दो दलों में विभाजित होता रहा।वर्ष 1972 में 296 विधानसभा सीटों के परिणामों में से 268 सीटें कांग्रेस व जनसंघ के खातों में गईं। इसी तरह वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में कुल 320 सीटों में से 314 सीटें कांग्रेस-जनता पार्टी को मिलाकर मिलीं। फिर 1980 के विधानसभा चुनाव में 320 सीटों में से 306 सीटें कांग्रेस और भाजपा को मिलाकर मिलीं।
कम सीटें मिलीं, फिर भी बड़े नेता जीते
भाजपा को कम सीटें मिलने के बाद भी उनके तीनों बड़े नेता सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्र कुमार सखलेचा और कैलाश जोशी चुनाव जीत गए। इनके अलावा शीतला सहाय, नगीन कोचर, बाबूलाल गौर, निर्भय सिंह पटेल, विक्रम वर्मा, थावरचंद गहलोत आदि भी विधायक निर्वाचित हुए। इससे उलट नंदकुमार चौहान, भेरूलाल पाटीदार, बाबूलाल जैन, रामकृष्ण कुसमारिया, रामहित गुप्ता, मुकुंद सखाराम नेवालकर, नंदकुमार साय, रेशमलाल जांगड़े आदि भाजपा नेता चुनाव हार गए।
राजनीतिक विश्लेषक गिरिजाशंकर की पुस्तक ‘चुनावी राजनीति मध्यप्रदेश’ से प्रमुख अंश...
Updated on:
16 Oct 2023 11:59 am
Published on:
16 Oct 2023 11:45 am
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