20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

mp assembly election 2023: सिंधिया ने जो अब किया, गोविंद नारायण ने 1967 में किया था

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जो अब किया, गोविंद नारायण ने 1967 में कर दिया, गोविंद नारायण ने मंत्री नहीं बनाए जाने पर पलट दी थी सरकार

3 min read
Google source verification

रीवा

image

Manish Geete

Oct 11, 2023

satna11_1.png

मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास पर ताजा दृष्टि डालने वालों के जेहन में वर्ष 2020 का ज्योतिरादित्य सिंधिया का बड़े उलटफेर वाला कदम अंकित होगा, जब उन्होंने कांग्रेस से बगावत कर उसकी सरकार उखाड़ फेंकने का काम किया। सिंधिया और उनके समर्थक 22 विधायकों के भाजपा में चले जाने से पंद्रह साल बाद सरकार बनाने वाली कांग्रेस की सत्ता दो साल से पहले ही छिन गई। ठीक इसी तरह या इससे मिलता जुलता कदम कांग्रेस के खिलाफ कांग्रेस के ही तत्कालीन विधायक गोविंद नारायण सिंह ने 1967 में बगावत का बिगुल बजाकर उठाया था।

इस बगावत की परिणति संविद सरकार के रूप में सामने आई, जिसमें गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सुशोभित हुए। गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में बनी संविद सरकार उस समय ही नहीं सर्वकालीन सबसे अधिक चर्चा में रही सरकारों में शुमार है। अब भी उस घटनाक्रम को राजनीतिक उलटफेर का बड़ा उदाहरण माना जाता है।


सतना के रामपुर बाघेलान के गोविंद नारायण सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा के खिलाफ मोर्चा खोलकर 37 विधायकों के साथ बगावत कर दी थी। उनको राजमाता विजयाराजे सिंधिया का समर्थन था। ग्वालियर में ही सभी बागी विधायक ठहराए गए थे।

विजयाराजे और मुख्यमंत्री मिश्रा के बीच विवाद

सियासी जानकार बताते हैं, 1967 के चुनाव में टिकट वितरण को लेकर विजयाराजे सिंधिया और मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा के बीच विवाद हो गया था। इसके चलते मिश्रा ने चुनाव के बाद उनके समर्थकों को मंत्री नहीं बनाया। इनमें गोविंदनारायण सिंह का भी नाम शामिल था। समय के साथ मिश्रा का विरोध बढ़ता गया। एक वित्तीय बिल के विरोध में सिंह ने सरकार के खिलाफ आवाज उठाई और कांग्रेस विधायकों को लेकर खुला मोर्चा खोल दिया।

ग्वालियर किले में रोके गए थे बागी विधायक

बगावत करने वाले विधायकों को ग्वालियर किले में ही रोका गया था। वहीं से राजमाता सिंधिया ने कई अन्य दलों के साथ ही निर्दलीय विधायकों से संपर्क कर संविद सरकार बनाने की योजना तैयार की। इसके बाद जनसंघ, हिन्दू महासभा, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, निर्दलीय को मिलाकर संयुक्त सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के पास पहुंचे। सीएम डीपी मिश्रा ने विधायकों को बर्खास्तगी की चेतावनी दी थी, लेकिन तत्कालीन केन्द्र सरकार ने राज्यपाल से सरकार को बर्खास्त नहीं करने और नई सरकार बनाने को कहा। इसके बाद सदन की नेता विजयाराजे सिंधिया चुनी गईं, लेकिन मुख्यमंत्री गोविंदनारायण सिंह बने। कांग्रेस ने फिर विपक्ष में बैठने का निर्णय लिया और श्यामाचरण शुक्ला को विपक्ष का नेता बनाया गया।

विंध्य से कई विधायकों ने दिया था साथ

गोविंद नारायण सिंह को बगावत में विंध्य से कई विधायकों ने पूरा साथ दिया। इसमें उस दौरान कांग्रेस के बड़े नेता रहे मैहर के विधायक गोपालशरण सिंह, देवतालाब के छोटेलाल हरिजन, विशेसर प्रसाद रैगांव, प्रेम सिंह सिंगरौली, त्रिभुवन सिंह देवसर सहित शहडोल के भी कई नेता उनके साथ थे। बाद में गोपाल शरण सिंह, छोटेलाल, प्रेम सिंह, विशेषर मंत्री बनाए गए थे। जनसंघ के कोटे से सतना के रामहित गुप्ता मंत्री बने थे।

बस्तर गोलीकांड की आंच सीएम तक पहुंची थी

राजनीतिक विश्लेषक धीरेश सिंह गहरवार बताते हैं कि बस्तर के राजा प्रवीणचंद्र भंगदेव स्थानीय मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। सुरक्षाबलों की गोली से उनकी मौत हुई तो आरोप तत्कालीन मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा पर लगा। इस घटनाक्रम से उस दौर के सभी राजघराने उनसे नाराज थे। ग्वालियर घराने के साथ अन्य ने सरकार गिराने में मदद भी की थी।

गोविंद नारायण के ऐतिहासिक काम

गोविंद नारायण सिंह ने अपने कार्यकाल में कई बड़े फैसले किए। 18 महीने तक संविद सरकार गोविंद नारायण ने ही चलाई। उन्होंने 74 मंत्री बनाए और उसी समय भोपाल के 74 बंगले भी बने। उन्होंने अपने कार्यकाल में रीवा को विवि, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज जैसे कई बड़े संस्थान दिए। सतना में रेलवे ओवरब्रिज, बाणसागर बांध के सर्वे की शुरुआत सहित अन्य कार्य किए। बाद में वह कांग्रेस में फिर जब लौटे तो उन्हें पार्टी ने टिकट ही नहीं दिया। उस समय अर्जुन सिंह भी उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी थे। कई वर्षों तक वह हाशिए पर रहे, बाद में राज्यपाल भी बनाए गए। अब उनका परिवार भाजपा में है।

प्रोटोकाल तोड़ आम लोगों से मिलते थे गोविंद नारायण

सिंह के कामकाज का अंदाज भी सबसे अलग तरह का था। वह अक्सर प्रोटोकाल तोड़कर आम लोगों से सीधा संवाद करते थे। कई बार अधिकारियों के सामने असहज स्थिति बन जाती थी। बोलचाल में भले ही वह ग्रामीण अंदाज में दिखते थे, लेकिन उनका विजन बड़ा था।