अमरीश पुरी B'day: 'मिनिस्ट्री ऑफ लेबर' में काम करने से लेकर बॉलीवुड के 'मोगैंबो' बनने तक ऐसा था अमरीश पुरी के जीवन का सफर
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| Updated: 22 Jun 2017, 01:29:00 PM (IST)
अमरीश पुरी B'day: 'मिनिस्ट्री ऑफ लेबर' में काम करने से लेकर बॉलीवुड के 'मोगैंबो' बनने तक ऐसा था अमरीश पुरी के जीवन का सफर

थियेटर एवं यथार्थवादी सिनेमा से लेकर मुख्यधारा की फिल्मों में अपनी अभिनय प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब के जालंधर में पंजाबी परिवार में हुआ था। अमरीश पुरी का पहले स्क्रीन टेस्ट खराब गया था जिसकी वजह से उन्हें 'मिनिस्ट्री ऑफ लेबर' में काम करना पड़ा।

Personal Life:

लंबे चौड़े कद, रौबदार आवाज, गेटअप और दमदार शख्सियत के जरिए फ़िल्म प्रेमियों के दिलों में सालों से डर पैदा करने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब के जालंधर में पंजाबी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला निहाल चंद पुरी और मां का नाम वेद कौर था। अमरीश पुरी गायक के एल सहगल के पहले कजिन थे। इसके बाद उनका परिवार शिमला में जाकर बस गया। उन्होंने हिमाचल के बीएम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की थी।


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Early Life:

अमरीश पुरी के लिए फिल्मी माहौल अपरिचित नहीं था और उनके बड़े भाई मदन पुरी हिंदी फिल्मों के स्थापित अभिनेता थे। लेकिन उनके लिए फिल्मों में प्रवेश आसान नहीं रहा। सही मायनों में मुख्यधारा की फिल्मों में उनका पदार्पण करीब 40 साल की उम्र में हुआ। अमरीश पुरी अक्सर स्क्रीन टेस्ट में फेल हो जाया करते थे। 'एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन' में काम करने के साथ उन्होंने पृथ्वी थिएटर में काम करना शुरू किया। सत्यदेव दुबे के नाटकों ने उन्हें खूब प्रसिद्धि दिलाई और 1979 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बस इसके बाद विज्ञापनों और फिल्मों ने उनके लिए अपने दरवाजे खोल दिए। 



Filmy Carrier-

अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई अमरीश पुरी हिन्दी फिल्मों की दुनिया का एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अभिनेता के रूप निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से अपनी पहचान बनाने वाले श्री पुरी ने बाद में खलनायक के रूप में काफी प्रसिद्धी पाई। बेजोड़ आवाज के स्वामी और रोबीले व्यक्तित्व के धनी अमरीश पुरी ने अपने बेहतरीन हावभाव से खलनायकों की भूमिका को हीरो के समकक्ष बना दिया और आखिरी दृश्यों को छोड़कर पूरी फिल्म में उनका खौफ साफ दिखता रहा।  वह उन अभिनेताओं में थे जिन्होंने साबित कर दिया कि कला फिल्मों के कलाकार भी मुख्यधारा में आकर सितारा बन सकते हैं और दर्शकों को सिनेमाघर तक जुटाने की क्षमता रखते हैं।



उन्होंने 1984 मे बनी स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म "इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम" में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही। इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया। इस कारण खलनायक की भूमिका भी उन्हें काफ़ी मिली। अमरीश के फिल्मी करियर की शुरुआत साल 1970 में आई फिल्म प्रेम पुजारी के साथ हुई। अपने करियर के दौरान उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों में काम किया था। पुरी को 1980 में आई फिल्म 'हम पांच' में अपने विलेन के किरदार की वजह से पहचान मिली। इस फिल्म में उन्होंने मुख्य विलेन का रोल निभाया था। 1980 से 1990 के दशक में उनकी पॉपुलैरिटी का आलम यह था कि लगभग हर फिल्म में विलेन का किरदार अमरीश पुरी को ही मिलता था। 




व्यवसायिक फिल्मों में प्रमुखता से काम करने के बावज़ूद समांतर या अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर। और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया। अपने करियर के दौरान अमरीश पुरी ने कई फिल्मों में सकारात्मक भूमिका भी निभाई। जिसमें शाहरुख खान और काजोल की एवरग्रीन दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे प्रमुख है।  उनके द्वारा शाहरुख खान की हिट फिल्म "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" में निभाये गए "बाबूजी" के किरदार की प्रशंसा सर्वत्र की जाती है। 




दरअसल 39 साल की उम्र में ग्रेड 'ए' की सरकारी नौकरी छोड़कर फिल्मों में आए अमरीश अपने हुनर की कीमत जानते थे। फिल्म इंडस्ट्री ने उनको वो सम्मान कतई नहीं दिया जो उन्हें मिलना चाहिए था। मगर उनके जैसा दमदार विलेन भी मसाला फिल्मों की मूलभूत आवश्यकता बन गया था। उन्हें पता था कि उनकी आवाज और पत्थर जैसा चेहरा फिल्म इंडस्ट्री की जरूरत है। इसीलिए वो इंडस्ट्री के सबसे महंगे विलेन बन गए थे। इसके साथ-साथ उनसे जुड़े दो नियम और थे। एक तो वो कभी इंटरव्यू के लिए अपनी आवाज रिकॉर्ड नहीं करने देते थे और दूसरा कवर स्टोरी से कम पर किसी मैग्जीन को इंटरव्यू नहीं देते थे। अपनी प्रतिभा के साथ न्याय करवाने का उनका अपना तरीका था। उनके ही अंदाज में कहा जाए तो, 'इंटरव्यू चाहिए तो आओ कभी हवेली पर।' 



Awards:

उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा गया। अपने करियर के दौरान अमरीश पुरी को 'कोयला', 'बादशाह', 'करण अर्जुन' और 'गदर: एक प्रेम कथा' जैसी फिल्मों के लिए बेस्ट विलेन का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला था। 



Family:

अमरीश के बेटे राजीव पुरी फिल्मों में नहीं आए लेकिन उनका बेटा हर्षवर्धन पुरी यशराज फ़िल्म्स में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने अब तक तीन फिल्मों 'इश्कजादे, 'शुद्ध देशी रोमांस' और 'दावते इश्क' में कैमरे के पीछे रहकर काम किया हैं। 



Last Movie & Death:

उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किस्ना' थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज हुई। उनके निधन के बाद उनकी फिल्म 'कच्ची सड़क' भी रिलीज हुई थी। इसके अलावा अमरीश पुरी की आखिरी फिल्म 2009 में आई पूरब की लैला पश्चिम की छैला: हैल्लो इंडिया थी। 12 जनवरी 2005 को ब्रेन हैमरेज जैसी बीमारी से पीड़ित  इस बेहतरीन एक्टर ने 72 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था।उनके अचानक हुये इस निधन से बॉलवुड जगत के साथ-साथ पूरा देश शोक में डूब गया था।