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औरत की गलती माफ नहीं, मर्द की हिंसा जायज? आनंद एल राय पर लगा महिला विरोधी सिनेमा का आरोप, घिरे विवादों में

Tere Ishk Mein : फिल्म निर्देशक आनंद एल राय पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करने और महिला विरोधी सिनेमा बनाने को लेकर विवादों में घिरते नजर आए है, जिसमें फिल्म 'तेरे इश्क में' (Tere Ishq Mein) को टॉक्सिक सोच का एक नया और अधिक परेशान करने वाला वर्जन बताया जा रहा हैं।

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औरत की गलती माफ नहीं, मर्द की हिंसा जायज? आनंद एल राय पर लगा महिला विरोधी सिनेमा का आरोप, घिरे विवादों में

फिल्म -तेरे इश्क में का पोस्टर (सोर्स: IMDb)

Tere Ishk Mein : आज से करीब 32 साल पहले फिल्म 'डर' में शाहरुख खान ने एक ऐसे जुनूनी प्रेमी का रोल निभाया था, जो अपनी पसंदीदा औरत को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था। उस दौर में यश चोपड़ा ने उस 'ऑब्सेशन' को पर्दे पर रोमांटिक बनाने की कोशिश की थी।

अब निर्देशक आनंद एल राय अपनी नई फिल्म 'तेरे इश्क में' (Tere Ishq Mein) के साथ उसी टॉक्सिक सोच का एक नया और अधिक परेशान करने वाला वर्जन लेकर आए हैं। बता दें, फिल्म की कहानी और किरदारों के चित्रण को लेकर अब सोशल मीडिया और क्रिटिक्स के बीच एक बड़ी जंग छिड़ गई है। क्या ये वास्तव में 'इश्क' है या सिर्फ मानसिक प्रताड़ना, जो खुद को मरने पर मजबूर कर देता है?

आनंद एल राय पर लगा महिला विरोधी सिनेमा का आरोप

फिल्म में धनुष ने 'शंकर' का रोल निभाया है, जो एक दिशाहीन, बेरोजगार और हिंसक गुंडा है। तो वहीं कृति सेनन 'मुक्ति' के रोल में हैं। फिल्म की सबसे बड़ी खामी इसकी ये सोच है कि अगर एक पुरुष हिंसक और लापरवाह है, तो उसे सुधारने की पूरी जिम्मेदारी उस औरत की है जिसे वो प्यार करता है। दरअसल, आनंद एल राय और उनके राइटर ने शंकर के हिंसक व्यवहार को उसकी पर्सनैलिटी का हिस्सा बताकर उसे बरी कर दिया है, जबकि मुक्ति को हर मोड़ पर कठघरे में खड़ा किया है।

इतना ही नहीं, पूरी फिल्म में मुक्ति को एक 'वैम्प' यानी बुरी औरत की तरह पेश करने की कोशिश की गई है और शंकर एक बेकसूर इंसान को जिंदा जलाने की कोशिश करता है, लेकिन फिल्म इसे उसके 'प्यार का इजहार' बताती है। तो दूसरी तरफ, मुक्ति को एक ऐसी औरत दिखाया गया है जो शंकर को गुमराह कर रही है। फिल्म का नैरेटिव ये है कि शंकर के जीवन में जो कुछ भी गलत हो रहा है, चाहे वो उसके पिता की खराब हालत हो या उसकी अपनी कामियां उन सब की वजह सिर्फ मुक्ति को ही दिखाया गया है।

हिंसा और बेरोजगारी को सबने नजरअंदाज किया

फिल्म के लेखकों ने मुक्ति के रोल को और भी भयानक दिखाने के लिए उसे एक गैर-जिम्मेदार मां के रूप में भी पेश किया। फिल्म में दिखाया गया है कि वो अपनी प्रेग्नेंसी के दौरान शराब पीती है। उसे अपने पिता की मौत का कारण भी मान लिया जाता है, जबकि शंकर की हिंसा और बेरोजगारी को सबने नजरअंदाज किया। ये समाज की उस रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देता है जहां एक वयस्क पुरुष को एक ऐसे बच्चे की तरह देखा जाता है, जो 'ना' (No) का मतलब नहीं समझता और ये बहुत गलत बात है, जहां औरत की गलती माफ नहीं होती और मर्द की हिंसा जायज होती है, जो दर्शको को रास नहीं आया।

बता दें, कहानी में शंकर बाद में एक भारतीय वायु सेना (IAF) अधिकारी बन जाता है, लेकिन वहां भी वो मुक्ति की वजह से अपनी ड्यूटी नहीं कर पाता, ऐसा दिखाया गया है। फिल्म बार-बार ये संदेश देती है कि एक औरत को हमेशा पुरुष के बदलाव का जरिया बनना चाहिए और अगर वो असफल होती है, तो वो समाज की नजर में दोषी है। इसे गलत तरह से पेश किया गया है, जिसको दर्शक दोहरा बर्ताव बता रहे हैं, लेकिन इसकी कहानी बहुत दमदार है, अगर आप एक ऐसी कहानी की तलाश में हैं जो जुनून को सही ठहराती हो, तो शायद ये आपको पसंद आ सकता है, लेकिन मेरे नजरिए से ये फिल्म प्यार कम और प्रताड़ना ज्यादा लगती है।