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जब जापानियों ने बनाया युद्धबंदी, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बचाई थी इस एक्टर की जान

Nazir Hussain in Azad Hind Fauj: वो जांबाज सिपाही जिसने बिमल रॉय के साथ मिलकर अपनी किस्मत बदली और भोजपुरी सिनेमा का बाप कहा जाने लगा, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आजाद हिंद फौज में सेवा देने वाले शास्त्री ने फिल्मी करियर की शुरुआत बिमल रॉय के निर्देशन में की, जिसने उन्हें अभिनय की दुनिया में एक मजबूत पहचान दिलाई।

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जब जापानियों ने बनाया युद्धबंदी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और नजीर हुसैन (फोटो सोर्स: x)

Nazir Hussain in Azad Hind Fauj: बॉलीवुड के इतिहास में कुछ शख्सियतें ऐसी हैं जिनकी जिंदगी किसी फिल्म से भी ज्यादा मजेदार और प्रेरणादायक होती है। एक ऐसे ही इंसान की कहानी आज हम आपको बताने जा रहे हैं , जो कभी ब्रिटिश फौज का सिपाही था, फिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज का हिस्सा बना, एक महान फिल्मकार बिमल रॉय का सहायक बना और अंत में 'भोजपुरी सिनेमा का जनक' कहलाया। ये कहानी है नजीर हुसैन की, एक ऐसे इंसान की जिसने एक नहीं, कई जिंदगियां जीं।

युद्धबंदी के रूप में कैद में बैठे नजीर के मन पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस

नजीर हुसैन की कहानी शुरू होती है फौज से। बता दें, शुरुआती दिनों में उन्होंने ब्रिटिश सेना ज्वाइन की, लेकिन युद्ध के दौरान जापानियों ने उन्हें बंदी बना लिया। युद्धबंदी के रूप में कैद में बैठे नजीर के मन पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों का गहरा असर पड़ा। साथ ही, नेताजी ने जब आजाद हिंद फौज को दोबारा खड़ा किया तो नजीर भी उसका हिस्सा बन गए। नेताजी ने ही उन्हें कैद से छुड़वाया और वो आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इसके साथ ही, एक दोस्त की सलाह पर नजीर हुसैन कोलकाता चले गए जहां उन्हें थिएटर में छोटे-मोटे रोल मिलने लगे। यहीं पर महान फिल्मकार बिमल रॉय की नजर उन पर पड़ी। रॉय ने उन्हें 1950 में रिलीज हुई फिल्म 'पहला आदमी' में एक भूमिका दी। ये फिल्म जबरदस्त हिट रही और नजीर हुसैन का फिल्मी करियर एक नई उड़ान पर निकल पड़ा।

बिमल रॉय को उनका काम इतना पसंद आया कि उन्होंने नजीर को कई फिल्मों में मौका दिया। 1953 की 'दो बीघा जमीन' और 1955 की 'देवदास' ये दोनों फिल्में भारतीय सिनेमा की कालजयी कृतियों में शामिल हैं और नजीर हुसैन इन दोनों का हिस्सा थे।

नजीर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना चुके थे

दरअसल, जब नजीर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बना चुके थे, तभी एक ऐसी मुलाकात हुई जिसने उनकी जिंदगी का रुख हमेशा के लिए बदल दिया। एक पुरस्कार समारोह में नजीर की मुलाकात भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से हुई, क्योंकि राष्ट्रपति बिहार से थे, नजीर ने उनसे भोजपुरी में बात की। एक बॉलीवुड एक्टर के मुख से इतनी धाराप्रवाह और मीठी भोजपुरी सुनकर राष्ट्रपति बहुत प्रसन्न हुए।

राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें भोजपुरी भाषा की फिल्मों को बढ़ावा देना चाहिए और उनमें अभिनय भी करना चाहिए। राष्ट्रपति की ये सलाह नजीर के दिल में उतर गई और उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। इसके बाद राष्ट्रपति की प्रेरणा से नजीर हुसैन ने 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' नाम की फिल्म की पटकथा लिखी। इस फिल्म में एक्ट्रेस लीला मिश्रा भी थीं जिन्हें दर्शक बाद में 'शोले' में बसंती की मौसी के रूप में पहचानते हैं।

भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बनी

ये फिल्म भोजपुरी सिनेमा की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बनी। इसकी कामयाबी ने एक पूरी भाषा के सिनेमा की नींव रख दी। इसके बाद नजीर हुसैन ने भोजपुरी में एक के बाद एक फिल्में बनाईं और एक पूरी नई इंडस्ट्री को जन्म दिया। यही कारण है कि उन्हें आज 'भोजपुरी फिल्मों का जनक' कहा जाता है।

बता दें, नजीर हुसैन ने अपने पूरे करियर में लगभग 500 फिल्मों में काम किया। एक कैरेक्टर एक्टर के रूप में उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनाई। लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत भोजपुरी सिनेमा है जो आज करोड़ों लोगों की भाषा और संस्कृति की आवाज बन चुका है। दरअसल, 1987 में सिर्फ 65 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया, लेकिन उनका काम और उनकी भोजपुरी सिनेमा की विरासत आज भी उतनी ही जिंदा है।