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मैडम के जूते लाओ… सेट पर Javed Akhtar को करनी पड़ती थी ऐसी ड्यूटी

बॉलीवुड के दिग्गज गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में अपने बेबाक अंदाज से समां बांध दिया। वरीशा फरासत के साथ बातचीत में उन्होंने भाषा, समाज और फिल्म इंडस्ट्री के बदलते स्वरूप पर खुल कर चर्चा की।

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जयपुर

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Aman Pandey

Jan 15, 2026

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"करोड़ों चेहरे… और उनके पीछे और भी चेहरे…"
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) की उस रंग-बिरंगी सुबह जब बॉलीवुड के दिग्गज गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर मंच पर आए तो सत्र का आगाज उनके शब्दों के उसी तेज, गहराई और शिल्प (क्राफ्ट) के साथ हुआ, जिसने भारतीय सिनेमा और लोकप्रिय संस्कृति को दशकों तक नई दिशा दी है।

मन के द्वंद्व को कुरेदती उनकी कविताओं में जब भीड़, जमीर और व्यक्तिगत संघर्ष की तस्वीरें उभरीं, तो होटल क्लार्क्स आमेर का पूरा परिसर सन्नाटे में डूब गया। इसके बाद, उसी सन्नाटे और वैचारिक ठहराव को तोड़ते हुए वे जीवन, भाषा, सिनेमा और सेक्युलरिज्म पर ऐसी बेबाकी से बोले कि वह सत्र 'पॉइंट्स ऑफ व्यू' से कहीं अधिक 'पॉइंट्स ऑफ रियलिटी' बनकर उभरा।

जावेद अख्तर का ‘सेक्युलर’ पर तंज

सत्र ‘जावेद अख्तर: पॉइंट्स ऑफ व्यू’ में वरीशा फरासत के साथ हुई बातचीत में अख्तर ने कहा कि सेक्युलर का कोई क्रैश कोर्स नहीं होता। कोई सिखाएगा तो वो फेक होगा। सेक्युलर आपको आपके आसपास के माहौल से मिलता है। उन्होंने बताया कि उनके अंदर सेक्युलर मूल्यों की शुरुआत बचपन में नाना-नानी के माहौल से हुई। उन्होंने कहा कि नाना-नानी पढ़े-लिखे नहीं थे, अवधी बोला करते थे और पांच वक्त की नमाज पढ़ते थे। इसी माहौल ने उन्हें सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया।

'संस्कृत हजारों साल पुरानी, उर्दू कल की बच्ची'

भाषा को लेकर उठे सवाल पर अख्तर ने कहा कि संस्कृत पहले आई या उर्दू, यह सवाल ही गलत है। संस्कृत हजारों साल पुरानी है, उर्दू तो कल की बच्ची है। तमिल सबसे पुरानी जिंदा भाषा है। उन्होंने कहा कि भाषाओं की तुलना करने के बजाय उनके इतिहास और विकास को समझना चाहिए।

सिनेमा पर अख्तर

सिनेमा पर बात करते हुए अख्तर ने बताया कि आज फिल्म इंडस्ट्री काफी मैच्योर और प्रोफेशनल हो चुकी है। मुझे याद है जब मैं असिस्टेंट डायरेक्टर था, तो इस पद की बिल्कुल इज्जत नहीं थी। हमारा काम क्या था? 'मैडम के जूते जल्दी लाओ।' 'हीरो का कोट कहां है?' यही हमारी जिंदगी थी। आज के असिस्टेंट स्टार्स को उनके नाम से बुलाते हैं। जब मैं उन्हें देखता हूं तो डर जाता हूं। असिस्टेंट डायरेक्टर हीरो को उनके नाम से बुला रहे हैं- हम इसकी कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे।" उन्होंने कहा कि पहले इंडस्ट्री में पैसे की कमी थी, लेकिन आज पैसा इतना अधिक है कि कई लोग उसी में खराब हो जाते हैं।

'ChatGPT ने लोगों को किताबों से दूर किया'

नए दौर की पढ़ने की आदतों पर अख्तर ने चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि व्हाट्सऐप और ChatGPT ने लोगों को किताबों से दूर कर दिया है। लोग आर्टिफिशियल जवाब ढूंढते हैं, जबकि जो किताबों में है, वह कहीं नहीं है।” उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि केवल क्लासिक्स नहीं, बल्कि स्टेशन पर मिलने वाले लाइट लिटरेचर भी पढ़ते रहना चाहिए।

'कॉम्पिटिशन खुद से रखें'

बच्चों और युवाओं को संदेश देते हुए अख्तर ने कहा कि कॉम्पिटिशन खुद से रखिए। दूसरों से तुलना बेकार है, जिंदगी में कई आपसे अच्छे और कई आपसे कमजोर होंगे। यह समझकर आगे बढ़िए।

कार्यक्रम के दौरान जब उनसे ‘चश्मा क्यों नहीं लगा’ पूछा गया तो अख्तर ने हंसते हुए कहा, “अच्छे चेहरे देखें, अच्छी नीयत रखें, चश्मा नहीं लगेगा।” इस टिप्पणी पर सभागार में ठहाके गूंजे।

इससे पहले JLF की शुरुआत होटल क्लार्क्स आमेर में ‘मॉर्निंग म्यूजिक: नाद- बिटवीन साउंड एंड साइलेंस’ से हुई। इस दौरान ऐश्वर्या विद्या रघुनाथन ने शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी। मुख्य समारोह में सीएम भजनलाल शर्मा, डिप्टी सीएम दीया कुमारी और प्रेमचंद बैरवा ने मंच पर उपस्थित रहकर उद्घाटन किया। पहले दिन साहित्य, संगीत और संस्कृति के बीच जावेद अख्तर का सत्र सबसे चर्चित रहा। उनकी बेबाकी, संवेदनशीलता और अनुभव ने दर्शकों को प्रभावित किया और JLF के पहले दिन को मजबूत खबरों और चर्चाओं से भर दिया।

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