शिव साधक और वैष्णवजन एक ही दिन मनाएंगे महाशिवरात्रि, रात्रि व्यापिनी चतुर्दशी में महाशिवरात्रि मनाने का विधान, इस बार रहेगी अनंत फलदायी
भगवान भोलेनाथ महादेव की आराधना का महाशिवरात्रि पर्व 13 फरवरी को मनाया जाएगा। इस बार शिव साधक और वैष्णवजन एक ही दिन यह पर्व मनाएंगे। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि इस बार 13 फरवरी को त्रियोदशी तिथि को प्रदोष व्रत है और चतुर्दशी तिथि भी रात्रि में ही आ जाएगी। हिन्दूधर्म ग्रंथों में रात्रि व्यापिनी चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। ज्योतिष मर्मज्ञ पं. केदारनाथ दाधीच ने व्रतराज ग्रंथ में नारद संहिता, निर्णय सिन्धु और धर्म सिन्धु आदि ग्रंथों का हवाला देते हुए बताया कि जब त्रयोदशी सूर्यास्त के लगभग रहे और फिर चतुर्दशी तिथि आ जाए और वह पूरी रात्रि रहे, वह मह? शिवरात्रि ?? है।
इसी प्रकार कहा गया है कि महा शिवरात्रि व्रत अमान्तमान से माघ कृष्णा चतुर्दशी तथा पूर्णिमान्त मान से फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी के दिन होता है। इसे अर्धरात्रव्यापिनी चतुर्दशी में करना चाहिए। नारद संहिता में कहा गया है कि जिस दिन माघ (फाल्गुन) कृष्णा चतुर्दशी आधी रात के साथ योग रखती हो उस दिन जो शिवरात्रि का व्रत करता है। वह अनन्त फल को पाता है। ज्योतिषि पं. कल्याण नारायण ने बताया कि इस बार चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी को रात्रि में ही आ जाएगी जो कि 14 फरवरी को 12: 47 बजे तक रहेगी। इसके बाद अमावस्या तिथि शुरू हो जाएगी। इसलिए 13 फरवरी को रात्रिव्यापिनी चतुर्दशी में ही महाशिवरात्रि मनाई जाएगी।
चार प्रहर की पूजा है विशेष फलदायी
महाशिव रात्रि के पर्व पर भगवान शिव की चार प्रहर की पूजा विशेष फलदायी होती है। ज्योतिषि पं. गिरधारी शर्मा ने बताया कि शाम को प्रदोषकाल से चार प्रहर की पूजा शुरू होती है और चार-चार घंटे के अंतराल में सम्पूर्ण रात्रि भगवान शिव की षोड्षोपचार पूजा की जाती है। इसमें जल, पंचामृत, बिल्वपत्र, आंक-धतूरा, चंदन, पुष्प आदि के साथ ही भगवान शिव का दुग्धाभिषेक और गंगाजल अभिषेक किया जाता है।
बिल्व पत्र, गाय का दूध शिव को प्रिय
भगवान शिव की पूजा में बिल्व पत्र, गाय के दूध और गंगाजल की विशेष महत्वता है। ये तीनों ही शिव को अतिप्रिय हंै। क्योंकि मां पार्वती ने केवल बिल्व पत्र के सहारे शिवप्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी। इसलिए यह शिव प्रिय है।
इसी प्रकार गाय के दूध को पृथ्वी पर अमृत के समान माना गया है और गंगा को शिव ने अपनी जटा में धारण किया है। इस लिए ये तीनों ही भगवान शिव को विशेष प्रिय हैं।