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बड़ा खुलासा, भारत में 5.8 करोड़ बुजुर्गों को नहीं मिल रही पेंशन, नेपाल से भी बुरे हालात

रिपोर्ट में कहा गया है कि पेंशन के मामले में भारत की स्थिति नेपाल जैसे छोटे देशों से भी खराब है।

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बड़ा खुलासा, भारत में 5.8 करोड़ बुजुर्ग पेंशन से वंचित

नई दिल्ली। देश में 5.8 करोड़ बुजुर्गों को पेंशन या कोई अन्य प्रकार की सहायता नहीं मिलती है। यह बात सिविल सोसायटी संगठन पेंशन परिषद ने अपनी एक रिपोर्ट के आधार पर कही है। भारत में पेंशन की स्थिति रिपोर्ट-2018 का जिक्र करते हुए अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने कहा कि बुजुर्गों के लिए आय सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली प्रमुख योजना इंदिरा गांधी राष्ट्रीय सामाजिक सहायता (आईजीएनओएपीएस) कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.04 फीसदी खर्च करती है। पटनायक ने कहा कि वर्तमान जीडीपी का महज 1.6 फीसदी खर्च करने से देश के 90 फीसदी बुजुर्गो को हर महीने 2,500 रुपए पेंशन मिलेगी।

मात्र 2.23 करोड़ लोगों तक पहुंचती है पेंशन राशि

ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से संचालित कल्याणकारी योजना राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) के अनुसार, आठ करोड़ बुजुर्ग 200 रुपए मासिक पेंशन के लिए अधिकृत हैं। पेंशन परिषद के संयोजक निखिल डे ने कहा कि यह अत्यल्प रकम भी महज 2.23 करोड़ लोगों तक पहुंचती है। संगठन ने कहा कि नेपाल, बोलिविया, लेसोथो, बोत्सवाना, इक्वाडोर जैसे छोटे देश भी भारत की तुलना में अपने बुजुर्गो को बेहतर सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्रदान करते हैं।

कौशलयुक्त गरीबों के उत्थान के लिए 'जियो! लिव इट'

कला एवं संस्कृति को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी, गैर-सरकारी संस्था द एशियन हेरिटेज फाउंडेशन ने आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन कौशलयुक्त तबकों के उत्थान और आजीविका के लिए 'जियो! लिव इट' परियोजना की शुरुआत की है। संस्था ने शनिवार को एक बयान में कहा कि 'जियो! लिव इट' नामक यह संपर्क कार्यक्रम 2 से 20 अक्टूबर तक चलेगा, जिसकी शुरुआत पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस तथा कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान करेंगे। बयान में कहा गया कि एशियन हेरिटेज फाउंडेशन की पहल जियो! प्रोजेक्ट एक स्वदेशी ब्रांड है, जिसे जापान सामाजिक विकास निधि की ओर से आर्थिक सहयोग मिल रहा है। विश्व बैंक इसकी निगरानी कर रहा है। जियो 'झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश के सुविधाहीन जनजातीय समुदायों के लिए समावेशी व्यावसायिक मॉडलों का निर्माण' नामक इस परियोजना की शुरुआत साल 2014 में हुई थी, जिसका उद्देश्य इन समुदायों के लिए आजीविका के उपाय करना और पारंपरिक कौशल वाले क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना है।