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मंगलवार विशेष: आज के दिन इस हनुमान मंदिर में दर्शन करने से मिट जाते हैं सभी कष्ट, हनुमान जी करते हैं भक्तों का कल्याण, देखें वीडियो

— सुहागनगरी में स्थित इस 2300 वर्ष पुराने हनुमान मंदिर की अनोखी है गाथा, बड़े—बड़े राजनेता और उद्योपगति झुकाते हैं सिर।

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Hanumaj G

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फिरोजाबाद। मंगलवार का दिन हनुमान जी की पूजा के लिए सबसे उपर्युक्त दिन है। आज के दिन हनुमान जी की पूजा अर्चना करने से वह शीघ्र प्रसन्न होते हैं। भक्तोंं के संकट हनुमान जी क्षण में दूर करते हैं। इसलिए हनुमान जी को संकट मोचन भी कहा जाता है। करीब 2300 वर्ष पुराने इस हनुमान मंदिर की गाथा अनोखी है। भूमि खुदाई में निकली हनुमान प्रतिमा भक्तों का कल्याण करने वाली है।

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2300 साल पुराना है मंदिर
यह बात करीब 2300 साल पुरानी है। उस समय फिरोजाबाद का यह स्थान खंडहर के रूप में तब्दील था। आबादी के नाम पर यहां वीरानी सडकें थी। इस जगह पर साधु महात्माओं का डेरा था। पेड की छांव में यहां सैकडों साधु महात्मा तपस्या किया करते थे।

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तप करने के लिए की थी गुफा की खुदाई
महात्माओं ने तप करने के लिए यहां गुफा की खुदाई की थी। उसी दौरान जमीन से यह हनुमान जी की प्रतिमा निकली। मंदिर के महंत जगजीवन राम मिश्र जी बताते हैं कि उस दौरान महात्माओं ने इस मूर्ति को ऐसे ही यहां स्थापित करा दिया था। उस दौरान यह स्थान टीले के रूप में परिवर्तित था। इसलिए कोई भी यहां आने से कतराता था।

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कंधे पर बैठे हैं भगवान राम और लक्ष्ण
महंत बताते हैं कि हनुमान जी की प्रतिमा जिस आकार में है। वह चलने की मुद्रा में है। प्रतिमा में उनकी एक आंख ही नजर आ रही है। उनके दोनों पैर एक दूसरे के विपरीत आकार में हैं। उनके कंधे पर भगवान राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। बताया जाता है कि जब अहिरावण ने राम और लक्ष्मण को बंदी बना लिया था और वह उनकी बलि देने की तैयारी कर रहा था। तब हनुमान जी ने उन्हें अहिरावण का वध करके बचाया था। उस दौरान उन्होंने चक्र भी धारण किया था। मूर्ति में राम और लक्ष्मण के साथ उनके हाथ में चक्र और गदा भी नजर आ रहा है।

18-20 साल में छोडते हैं चोला
बताते हैं कि हनुमान जी की प्रतिमा चमत्कारी है। यह 18-20 साल बाद स्वतः ही अपने ऊपर लगे चोले को छोड देती है। उसके बाद भगवान के प्राकृतिक स्वरूप के दर्शन होते हैं। चोला छोडने के बाद उनके शरीर पर एक बूंद भी सिंदूर शेष नहीं रहता। अभी वर्ष 2002 में चोला छोडा था। जिसका वजन करीब 40 किलो था। इस चोले को हरिद्वार गंगा में प्रवाहित कराया गया था। इस मंदिर के आस—पास बंदर काफी संख्या में एकत्रित रहते हैं।