23 मार्च 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

इच्छामृत्यु वाले हरीश राणा को लेकर बढ़ी बेचैनी, 1 हफ्ते से नहीं दिया खाना-पानी, कभी भी आ सकती है बुरी खबर

दिल्ली AIIMS में 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से इच्छामृत्यु प्रक्रिया जारी है। 13 साल से वे वेजिटेटिव स्टेट में थे।

2 min read
Google source verification
Harish Rana case

Harish Rana Passive Euthanasia Case (Photo: X/@vaibhavank)

Harish Rana Euthanasia Case Latest Update: दिल्ली के AIIMS में इच्छामृत्यु की प्रक्रिया चल रही 32 साल के हरीश राणा को लेकर डॉक्टरों और मेडिकल टीम में बेचैनी बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह देश का पहला ऐसा मामला है, जहां लाइफ सपोर्ट हटाकर मरीज को शांतिपूर्ण मौत की इजाजत दी गई है। अब स्थिति ऐसी है कि हरीश को 1 हफ्ते से ज्यादा समय से खाना-पानी नहीं दिया जा रहा है। कभी भी बुरी खबर आ सकती है।

हरीश राणा की हालत और प्रक्रिया

हरीश राणा 13 साल से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (कोमा जैसी स्थिति) में थे। 2013 में चंडीगढ़ में चौथी मंजिल से गिरने से उनका ब्रेन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी। इसके बाद 14 मार्च को उन्हें गाजियाबाद से दिल्ली AIIMS के पेलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने लाइफ सपोर्ट सिस्टम, वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब (PEG ट्यूब से न्यूट्रिशन और पानी) सब हटा दिए। अब हरीश को नॉर्मल बेड पर रखा गया है। प्रक्रिया धीरे-धीरे चल रही है, ताकि मौत प्राकृतिक और दर्द रहित हो।

1 हफ्ते से खाना-पानी बंद

AIIMS के डॉक्टरों ने खाना-पानी पूरी तरह बंद कर दिया है। ब्लड सैंपल भी अब नहीं लिए जा रहे। यह प्रक्रिया 1-2 हफ्ते या इससे ज्यादा समय ले सकती है। हरीश की बॉडी अब बिना किसी बाहरी मदद के जो समय तक चलेगी, चलेगी। परिवार से मिलने की अनुमति भी कम या बंद कर दी गई है। डॉक्टर कहते हैं कि यह सब दर्द रहित तरीके से हो रहा है।

डॉक्टरों में बढ़ती बेचैनी

AIIMS की टीम, खासकर पेलिएटिव मेडिसिन और एनेस्थीसिया विभाग की हेड डॉक्टर सीमा मिश्रा के नेतृत्व में 10 डॉक्टरों का स्पेशल बोर्ड हरीश पर नजर रखे हुए है। डॉक्टरों में सबसे बड़ी चिंता यह है कि हरीश को किसी भी तरह का दर्द न हो। वे लगातार दवाएं दे रहे हैं ताकि ब्रेन और बॉडी को आराम मिले। बाहर से वार्ड में सन्नाटा है, सिर्फ मशीनों की बीप सुनाई देती थी, अब वो भी कम हो गई है। टीम हर पल सतर्क है क्योंकि स्थिति बहुत संवेदनशील है। डॉक्टरों को डर है कि प्रक्रिया में कोई तकलीफ न हो, इसलिए वे पूरी सावधानी बरत रहे हैं।

परिवार की बेबसी और उम्मीद

यह सिर्फ एक मरीज की कहानी नहीं, बल्कि परिवार की लंबी जद्दोजहद, विज्ञान की सीमाओं और मौत के बाद भी जिंदा रहने वाली उम्मीद की कहानी है। हरीश के माता-पिता ने सालों तक इंतजार किया, लेकिन अब वे भी मान चुके हैं कि यह उनके बेटे के लिए बेहतर है। डॉक्टरों की टीम आखिरी पलों को आसान बनाने में जुटी है।