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अमेरिका से आई नेपियर घास का मॉडल बना बहराइच, जानिए इसकी विशेषता

अमेरिका से आई नेपियर घास किसानों के लिए काफी मुनाफे का सौदा है। बहराइच में बड़े पैमाने पर इसकी खेती होने लगी है। बहराइच घास का यह मॉडल पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।

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नेपियर घास

पशुओं के हरे चारे के संकट से निपटने के लिए पूरे प्रदेश में नेपियर घास उगाई जाएगी। इस घास में प्रोटीन की मात्रा अधिक पाए जाने के कारण पशुओं की सेहत के लिए काफी अच्छी मानी जाती है।

देवीपाटन मंडल में डेयरी उद्योग की अपार संभावनाएं हैं। गोंडा बहराइच सहित कई जिलों में दूध का सूखे पाउडर बनाने का काम शुरू होने के बाद दूध की डिमांड बढ़ी है। दूध की डिमांड बढ़ने के साथ-साथ पशुपालक भी डेयरी की तरफ अग्रसर हुए हैं। डेयरी उद्योग में हरे चारे की डिमांड पूरे वर्ष रहती है। पशुओं को हर मौसम में हरा चारा मिलता रहे। इसके लिए नेपियर ग्रास काफी अच्छी मानी जाती है। घास में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण जहां पशुओं की सेहत अच्छी रहती है। वही इस घास को खिलाने से दूध की मात्रा पर भी काफी असर पड़ता है।

बहराइच डीएम ने बंगले पर उगाई नेपियर घास

बहराइच के जिलाधिकारी ने अमेरिका की नेपियर घास को सबसे पहले अपने बंगले पर उगाया। डीएम की इस पहल के बाद बहराइच के किसान भी आगे आए। वर्तमान समय में बहराइच जिले में करीब 700 एकड़ में नेपियर घास की खेती की जाती है। इसको हम आसान भाषा में कहें तो पशुओं के लिए हरा चारा के रूप में नेपियर ग्रास का उपयोग किया जाता है। डीएम के इस पहल के बाद प्रदेश के मुख्य सचिव ने इस घास को पूरे प्रदेश में उगाए जाने के लिए आदेश किया है।

जानिए नेपियर घास की विशेषता

नेपियर घास एक बार लगाने के बाद 4 से 5 वर्षों तक इसकी कटाई की जा सकती है। 1 वर्ष में 4 से 5 बार तक कटाई की जा सकती है। इस घास में 12 से 14 प्रतिशत तक प्रोटीन पाई जाती है। पशुओं के सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। इस घास को खेतों की मेड़ पर भी लगाया जा सकता है। इसकी बुवाई का उपयुक्त समय वर्षा ऋतु होती है। एक बार लगाने के बाद 5 वर्षों तक हरे चारे का संकट खत्म हो जाता है। जानकारी के अभाव में अभी तक यहां के किसान हरे चारे के रूप में नेपियर घास का उपयोग नहीं कर पाए।

उप निदेशक कृषि बोले- किसानों को किया जा रहा जागरूक

उपनिदेशक कृषि ने बताया कि बहराइच जिले में करीब 700 एकड़ में नेपियर घास की खेती की जाती है। किसान अब इसके लिए आगे आने लगे हैं। उसके लिए किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है।