
सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है। नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है।
बसंत पंचमी को मां सरस्वती का जन्मदिन माना जाता है
जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।वसंत ऋतु को मधुमास के नाम से भी जाना जाता है। इसके आरम्भ होने के साथ सर्दी का समापन शुरू हो जाता है। इस मौसम में सभी वृक्ष पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई पत्तियों व पुष्पों को जन्म देते हैं।
ऐसी मान्यता है कि वसंत पंचमी की तिथि पर विद्या और ज्ञान की अधिष्ठाती देवी मां सरस्वती का जन्म हुआ था। इस कारण इस दिन इनकी पूजा का विशेष महत्व होता है।
वसन्त पंचमी की तिथि के दिन ही हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म हुआ था। इस वजह से भी वसंत पंचमी का विशेष महत्व होता है।
वसंत पंचमी का त्योहार हमें महान योद्धा पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। उन्होंने विदेशी हमलावर मोहम्मद ग़ोरी को 16 बार पराजित किया और उदारता दिखाते हुए हर बार जीवित छोड़ दिया।
वसंत पंचमी पर बहुत से शुभ कार्य सपंन्न किए जाते हैं। वसंत पंचमी के दिन कोई भी नया काम प्रारम्भ करना भी शुभ माना जाता है। जिन व्यक्तियों को गृह प्रवेश के लिए कोई मुहूर्त ना मिल रहा हो वह इस दिन गृह प्रवेश कर सकते हैं। या फिर कोई व्यक्ति अपने नए व्यवसाय को आरम्भ करने के लिए शुभ मुहूर्त को तलाश रहा हो तो वह वसंत पंचमी के दिन अपना नया व्यवसाय आरम्भ कर सकता है।
वसंत पंचमी का त्योहार देश के अलग-अलग भागों में कई तरह से मनाया जाता है। पंजाब में सरसों के पीले खेतों में झूमते और पीले रंग की पतंगों को उड़ाते देखा जा सकता है। ऋतु चक्र के अनुसार शिशिर ऋतु के बाद चैत्र और वैशाख दोनों ही महीने वसंत ऋतु के माने गए हैं। इस महीने को ‘ऋतुराज’नाम से, तो ‘मधुमास’से भी संबोधित किया जाता रहा है।
Published on:
05 Feb 2022 02:20 pm
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