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जिन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था, ताकि अन्य क्रांतिकारियों को इससे मिले प्रेरणा : जिलाधिकारी

गोंडा देश की आजादी में अपनी महती भूमिका निभाने वाले धरती मां के ऐसे अमर सपूत जिन्होंने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। ऐसे महान क्रांतिकारी राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के बलिदान दिवस के अवसर पर जेल परिसर स्थित उनकी प्रतिमा तथा यहां से से थोड़ी दूर टेढ़ी नदी के बूचड़ घाट स्थित उनके समाधि स्थल पर यज्ञ व हवन पूजन का कार्यक्रम प्रशासन एवं सामाजिक संगठनों द्वारा किया गया।

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जिलाधिकारी मार्कंडेय शाही सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारियों ने शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद राष्ट्रगान एवं हवन पूजन कार्यक्रम संपन्न होने के बाद पत्रकारों से रूबरू होते हुए कहा कि अमर शहीद राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को 17 सितंबर 1927 को गोंडा जेल में ब्रिटिश हुकूमत ने काकोरी कांड के इस अमर शहीद को फांसी के फंदे पर लटका दिया था। इतिहास के जानकारों के मुताबिक लाहिड़ी जी को 19 दिसंबर 1927 की तारीख फांसी देने के लिए निर्धारित की गई थी। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को अपने खुफिया तंत्र से यह सूचना मिली की गोंडा में चंद्रशेखर आजाद आकर कहीं छिपे हुए हैं।
वह किसी भी समय जेल से जबरन लाहिड़ी को छुड़ा सकते हैं। इस डर से अंग्रेजी प्रशासन ने निर्धारित से 2 दिन पूर्व ही राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को फांसी के फंदे पर लटका दिया। इनके बलिदान दिवस पर जहां सार्वजनिक अवकाश रहता है। वहीं प्रशासन के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन व अन्य कई संगठन धार्मिक अनुष्ठान कर धरती मां के इस वीर सपूत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जेल प्रशासन द्वारा लाहिड़ी की याद में एक पार्क का निर्माण कराया गया। हालांकि प्रशासनिक उपेक्षा के कारण अभी तक इस पार्क का सुंदरीकरण नहीं हो सका है। फिर भी प्रतिवर्ष बलिदान दिवस के अवसर पर प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा यहां पर पौधरोपण का कार्यक्रम किया जाता है।

राष्ट्रगान व वंदे मातरम के नारों से गूंजा परिसर

अमर शहीद राजेंद्र नाथ लहरी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद यज्ञ होम हवन पूजन कार्यक्रम आयोजन के दौरान राष्ट्रगान वंदे मातरम के के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा ऐसे महान क्रांतिकारी की वीर गाथा के कुछ अंश को यहां पर एक सिलापट पर अंकित किया गया है।