
बृजभूषण शरण सिंह के बयान से BJP में हलचल Source- Official FB
Brij Bhushan Sharan Singh News: उत्तर प्रदेश के दबंग नेता और कैसरगंज के पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। एक तो हाल ही में उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया है, जिसमें एक तरह से शक्ति प्रदर्शन किया है। दूसरा, एक पॉडकास्ट में उन्होंने साफ कहा कि अगर वह जिंदा रहे तो 2029 में लोकसभा चुनाव जरूर लड़ेगे। भाजपा से टिकट नहीं मिला, फिर भी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कोशिश रहेगी कि भाजपा से ही लड़ें। उनके इस बयान ने सियासी गलियारों में चर्चाओं को जन्म दिया है कि क्या टिकट नहीं मिला तो बृजभूषण पार्टी छोड़ देंगे? और यह भी कि क्या भाजपा यौन शोषण के एक आरोपी नेता को टिकट देगी? इसी आरोप के चलते बृजभूषण को सांसदी छोड़नी पड़ी थी और 2024 में भाजपा ने उनकी जगह उनके बेटे को टिकट दिया था।
हमने यह सवाल राजनीतिक विश्लेषक हेमंत तिवारी के सामने रखा। उन्होंने जवाब दिया कि अभी इस तरह के बयानों का कोई मतलब नहीं है। पार्टी अभी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियों में है और 2029 को लेकर दिया गया बयान अभी से किसी तरह का प्रभाव नहीं डालेगा। यही बयान 2028 में दिया जाएगा, तो उस समय की परिस्थिति के हिसाब से असर हो सकता है।
इस सवाल पर तिवारी ने कहा कि बृजभूषण सिंह 69 साल के हो गए हैं। इस उम्र में उनको अपनी नहीं, अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होनी चाहिए। बृजभूषण किसी अन्य पार्टी या निर्दलीय चुनाव लड़कर, उनके भविष्य के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे।
बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में बृज भूषण की जगह उनके बेटे करण भूषण सिंह को टिकट देकर भाजपा ने उन्हें संतुष्ट रखा था। तो क्या अगर बृजभूषण भाजपा से नाराज हुए तो उसे इसका नुकसान होगा? तिवारी कहते हैं- BJP के पास हर एक सीट का प्लान है। अगर बृज भूषण किसी दूसरी पार्टी से या निर्दलीय लड़ेगे, तो भाजपा नेतृत्व के पास उसका भी कोई तोड़ जरूर होगा। वैसे बृजभूषण शरण सिंह का BJP से गहरा नाता रहा है और वह उस नाते को तोड़ना नहीं चाहेंगे। उन्होंने कहा कि उनके दोनों बेटे BJP के टिकट पर विधानसभा और संसद में हैं। आगे जाकर वे मंत्री पद के दावेदार भी हो सकते हैं। ऐसे में बृजभूषण ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे बेटों के भविष्य पर कोई प्रभाव पड़े।
बृजभूषण शरण सिंह अपने क्षेत्र में बेहद लोकप्रिय माने जाते हैं। गोंडा और उसके आसपास के जिलों-गोंडा, बलरामपुर, बहराइच और श्रावस्ती में उनका खासा दबदबा है। उन्होंने इन जिलों में 50 से अधिक डिग्री और इंटर कॉलेज खोल रखे हैं और शिक्षा क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखी है। इसके अलावा अयोध्या और बस्ती मंडल में भी उनके कई शैक्षणिक संस्थान हैं। उनकी लोकप्रियता केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में भी है। यही वजह है कि उनके चुनावी मैदान में उतरने की घोषणा ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले बृजभूषण शरण सिंह पर कुछ महिला पहलवानों द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे। इस विवाद के चलते भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें कैसरगंज से टिकट नहीं दिया और उनके बजाय उनके बेटे करण भूषण सिंह को चुनाव मैदान में उतारा। करण ने चुनाव जीतकर अपने पिता की राजनीतिक विरासत को बनाए रखा। बृजभूषण ने एक चैनल के साथ बातचीत में दावा किया कि लोकसभा से उन्हें साजिश के तहत हटाया गया। उन्होंने कहा, "अगर मैं जिंदा रहा, तो लोकसभा लौटकर उस अपमान का घाव जरूर भरूंगा। चुनाव कहां से लड़ना होगा, यह जनता तय करेगी। मेरी कोशिश यही रहेगी कि बीजेपी के टिकट से ही फिर से लोकसभा जाऊं। अगर बीजेपी मेरे बेटे को टिकट देती है, तो भी मैं चुनाव लड़ूगा।"
राजनीति में अक्सर रणनीतिक बदलाव देखे जाते हैं और बृजभूषण सिंह के मामले में भी यह साफ नजर आता है। उन्होंने सपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की खुलकर तारीफ की। बृजभूषण ने कहा, 'जब मैं कठिन दौर से गुजर रहा था, तब अखिलेश यादव ने मेरे खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा। मैं उनका यह एहसान कभी नहीं भूलूंगा।' यह बयान उनके पुराने राजनीतिक नाते को फिर जीवित करता है। दरअसल, बीजेपी में आने से पहले बृजभूषण सपा के नेता थे और साइकिल के सहारे लोकसभा पहुंचे थे। यही कारण है कि अगर बीजेपी उन्हें टिकट नहीं देती, तो उनके पास सपा या अन्य विकल्पों पर विचार करने का अवसर बना रहेगा।
बृजभूषण की संसदीय यात्रा 1991 में गोंडा से शुरू हुई। हालांकि 1996 में उनके खिलाफ कई मामले दर्ज होने के कारण वे चुनाव नहीं लड़ सके, लेकिन उनकी पत्नी केतकी सिंह ने उनके लिए मैदान संभाला और जीत हासिल की। 1999 में बृजभूषण फिर से गोंडा से बीजेपी के टिकट पर जीतकर लौटे। 2004 में उन्होंने बलरामपुर से चुनाव जीता, लेकिन 2009 में UPA पक्ष में वोटिंग करने और पार्टी से मतभेद के कारण बीजेपी ने उन्हें बाहर कर दिया। इसके बाद उन्होंने 2008 में समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया और 2009 में कैसरगंज सीट से जीत हासिल की। 2014 में बीजेपी में लौटकर उन्होंने कैसरगंज सीट जीतकर अपनी पकड़ कायम रखी।
Published on:
10 Jan 2026 02:09 pm
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