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Kargil Vijay Diwas : सामने मौत, फिर भी अंतिम सांस तक लड़ने का शौक,जानिए एक सैनिक की जुबानी, कारगिल युद्ध की पूरी कहानी

Kargil Vijay Diwas : 26 जुलाई 1999 को लगातार 60 दिनों चलने वाला कारगिल युद्ध समाप्त हो गया। भारत के वीर सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना को परास्त कर दिया। ऐसे ही गोंडा के पूर्व सैनिक जो कारगिल युद्ध में दिव्यांग हो गए। लेकिन अब भी देश के लिए मर मिटने को तैयार हैं। कारगिल दिवस पर आज तमाम समाजसेवियों और जिलाधिकारी ने कारगिल के इस देवदूत को सम्मानित किया है। आइए जानते हैं, इस वीर सपूत से कारगिल युद्ध की कहानी उन्ही जुबानी।  

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पूर्व सैनिक विजय सिंह कारगिल

Kargil Vijay Diwas 2023 : जिन्होंने देश के दुश्मनों के छक्के छुड़ाए हो देश की आन बान शान के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर अंतिम सांस लड़ने का शौक रहा पूरा शरीर गोलियों से छलनी हो गया । जनपद के ऐसे वीर सपूत विजय सिंह की जान तो बच गई पर हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए। उसी में इनका एक पैर भी छोटा हो गया। इसके बावजूद आज भी अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक बार फिर अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार है।

Kargil Vijay Diwas : देश भर में कारगिल विजय दिवस 26 जुलाई को मनाया जाता है। यह दिवस कारगिल जंग में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के सम्मान दिवस के रुप में मनाया जाता है। 60 दिनों तक चले कारगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ था। इसमें पाकिस्तान के खिलाफ भारत की विजय हुई थी। युद्ध की शुरुआत पाक ने की थी। कारगिल विजय दिवस देश के लोगों में देश भक्ति का नया जोश भर देता है। कारगिल के ही एक हीरो विजय सिंह हैं। जिनके साहस और हौसले की कहानी लोगों को हैरान कर देती है। दो गोलियां और बम के टुकड़े लगने से शरीर छलनी था। आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था। गोली लगने के बावजूद अपने प्राणों की परवाह नहीं की। उन्होंने हार नहीं मानी और कारगिल में देश की रक्षा में अपने को न्योछावर कर दिया। इस युद्ध में उनका एक पैर जख्मी हो गया। तीन साल तक उनका इलाज चला। जिससे उनकी जान तो बच गई। लेकिन वे सदा के लिए विकलांग हो गए। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए विजय सिंह कारगिल ने बताया आज का दिन वह दिन जिस दिन कारगिल युद्ध में हिंदुस्तान का विजय पताका लहराया था। इस दिन पाकिस्तानियों ने ऐसे मुकी खाया था, कि आज के दिन उनका मुंह पूरी तरह से काला हो गया था। आज तक वह सर नहीं उठा पाए। उनके सैनिक और उनकी आने वाली पीढ़ी भी याद करेगी। पाकिस्तान हो सकता है, कभी सर उठाएं। लेकिन उन्हें सर उठाने में अब बहुत समय लगेगा। क्योंकि इतिहास में इतनी ऊंची पहाड़ी पर लड़कर भारत ने पाकिस्तान को परास्त किया था। उन्होंने कहा कि हम लोग तो मातृभूमि की रक्षा के लिए तब भी तैयार थे। आज ही तैयार हैं। और कल भी तैयार रहेंगे। युद्ध के दौरान अपने कुछ साथियों को खोने का आज भी उन्हें गम है। जब याद आता है तो आंखें भर आती हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर से प्रार्थना है कि उनके परिवार को सफल बनाएं। हमेशा खुश रखे। हमें उनकी याद जीवन रहने तक बना रहेगा।

कारगिल के नाम से मिली पहचान, विजय सिंह से बने विजय कारगिल

जनपद मुख्यालय के सिविल लाइन मोहल्ले में रह रहे कारगिल योद्धा विजय कुमार सिंह शौर्य और बहादुरी के चलते उपनाम कारगिल भी जुड़ गया। अब वे विजय सिंह कारगिल के नाम से मशहूर है। जिले के तरबगंज तहसील क्षेत्र के बेलसर ब्लाक अंर्तगत ऐली परसौली गांव में 1970 में जन्मे विजय सिंह की बचपन में ही सेना में जाने की इच्छा थी। वर्ष 1988 में जब लखनऊ में सेना भर्ती मेला लगा तो वे सेना में भर्ती हो गए। जब कारगिल में भारत पाक के बीच युद्ध शुरू हुआ तो वह बारामूला में 16 ग्रेनेडियर रेजीमेंट में बतौर नायक तैनात रहे। एमएमजी, एजीएल व एके 47 का प्रशिक्षण प्राप्त विजय सिंह को यूनिट के साथ द्रास सेक्टर भेजा गया। कारगिल हिल के पास टाइगर हिल के सामने व नीचे की ओर द्रास सेक्टर है। विजय सिंह कहते हैं कि नौ जून 1999 को कश्मीर के कारगिल में भीषण युद्ध शुरू हुआ। इस दौरान पता चला कि पाकिस्तानी फौज ने कारगिल सहित कश्मीर की 15 पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया है। पाक के इस नापाक इरादों की जानकारी होते ही फौज की सभी यूनिटों को एलर्ट करके जगह-जगह पहाड़ियों पर जवानों को भेज दिया गया।

पूर्व सैनिक को टीका लगाकर सम्मानित करती समाजसेविका उमा सिंह IMAGE CREDIT: Patrika original

सात बार किया दुश्मनों पर फायर

विजय सिंह बताते हैं कि कश्मीर में कारगिल सबसे ऊंची पहाड़ियों में है। जब लड़ाई शुरू हुई तो कमांडिंग आफीसर व दल नायक मेजर अजीत सिंह के नेतृत्व में उनकी यूनिट ने चढ़ाई शुरू कर दी। एक माह की लड़ाई में उनके यूनिट के 12 जवान शहीद हो गए। 22 जवान जख्मी हुए। 5100 नंबर की पहाड़ी पर निर्णायक युद्ध चल रहा था। पहाड़ी के नीचे उनके यूनिट के जवान फायरिंग कर रहे थे, और पहाड़ी पर चढ़ रहे थे। उनके बगल कवर फायरिंग के लिए इलाहाबाद का जवान अमर बहादुर भी था। विजय ने बताया कि पहली गोली उन्हें घुटने के नीचे लगी तो कुछ नहीं पता चला, बस एक ही संकल्प था कि साथी को तो खो दिया। लेकिन पहाड़ी ले के रहेंगे। वह आगे बढ़े ही थे, कि दूसरी गोली भी उनके घुटने के नीचे लगी तो पैर में कुछ चिपचिपाहट महसूस हुई। जब तक वह कुछ समझ पाते तब तक एक बम फटा और फिर आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा। इसके बावजूद लड़ाई जारी रही और सात बार दुश्मनों पर फायर किया, लेकिन पैर में गोली लगने से हुए रक्तस्राव से उनकी आंख के सामने अंधेरा छाने लगा। इसके बावजूद विजय अन्य जवानों के साथ युद्ध में जुट रहे। विजय कहते हैं कि युद्ध के दौरान दुश्मनों की ओर से निकली गोली उनके कमर में जा लगी। गोली लगते ही वह बेहोश हो गए और उनके साथी जवान धैर्य बंधाते रहे। बेहोशी अवस्था में वह 12 से 14 घंटे उसी पहाड़ी पर पड़े रहे। इसके बाद होश आया तो श्रीनगर अस्पताल में थे। जबकि उनके दो साथी अमर बहादुर सिंह व एक जाट रेजीमेंट का सैनिक शहीद हो गए। विजय सिंह ने बताया कि बेहोशी हालत में भी उनका इरादा था यदि दुश्मन सामने आ गए तो वे ग्रेनेड दगा देंगे, और दुश्मनों के साथ शहीद हो जाएंगे।

डीएम बोली- आज के दिन हमें उन सैनिकों के कर्तव्य बोध का संचरण होता

जिलाधिकारी नेहा शर्मा ने पूर्व सैनिक विजय सिंह को सम्मानित करते हुए कहा कि आज का दिन देश और राष्ट्र के प्रति तथा जिन जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी उनके प्रति श्रद्धांजलि देने का भाव है। वीर सैनिकों के कारण ही आज हम गौरव महसूस कर रहे हैं। आज के दिन हमें उन सैनिकों के कर्तव्य बोध का पुनः संचरण होता है।उन लोगों के परिवार के प्रति हम लोगों की जो भूमिका है। उसके प्रति हम सदैव तत्पर रहेंगे। इस अवसर पर केवी सिंह समाज सेविका उमा सिंह, धर्मवीर आर्य, सहित तमाम पूर्व सैनिक एवं समाजसेवी मौजूद रहे।