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गोंडा जिले के कादीपुर गांव में यूरोपियन सब्जी की खेती कर मुन्ना एकाएक चर्चा में आ गए। मुन्ना भाई इससे पहले परंपरागत खेती धान-गेहूं की करते थे। इन्होंने उद्यान विभाग से संपर्क किया। वहां से इन्हें सब्जी की खेती करने के तौर तरीके बताने के साथ-साथ इन्हें इसकी खेती करने के लिए कहां गया।
इससे पहले इन्होंने पंजाब में यूरोपियन कद्दू के विषय में जानकारी लिया था। पंजाब में यूरोपियन कद्दू की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी अधिक पैदावार होने के साथ-साथ बाजारों में इसकी मांग बहुत अधिक है।
किसान मुन्ना बताते हैं कि वर्तमान समय में वह एक हेक्टर में सब्जी और मत्स्य पालन का काम करते हैं। अपने ही खेत में इन्होंने तालाब भी बना रखा है। यूरोपियन- 56 कद्दू के बीज इन्होंने पंजाब से मंगाया था।
कैसे करें यूरोपियन कद्दू की खेती, एक गुच्छे में करीब 7 से 8 आते हैं फल
किसान मुन्ना कहते हैं कि यूरोपियन 56- कद्दू की एक प्रजाति है। इसकी पैदावार बहुत ही अच्छी है। अन्य कद्दू की तरह इसके पौधे जमीन में फैलते नहीं हैं। बल्कि बहुत थोड़ी जगह लेकर इनके तना खड़े रहते हैं। तथा गुच्छे में इनके फल आते हैं। खीरे के जैसा इनका आकार होता है।
एक गुच्छे में करीब 7 से 8 फल आते हैं। खेत तैयार करने के बाद नालियों बनाकर उनमें बीज बोए जाते हैं। सब्जी की खेती के लिए ड्रिप सिंचाई सबसे उत्तम विधि है। मुन्ना ने अपने एक एकड़ खेत में उद्यान विभाग के माध्यम से ड्रिप सिंचाई के लिए संयंत्र लगवाए हैं। इस संयंत्र को लगवाने के लिए उन्हें उद्यान विभाग के माध्यम से 90 प्रतिशत अनुदान भी मिला है।
खेतों में बिछाते पॉलिथीन, 2 तरीके के होते हैं लाभ
नालियों बनाकर बीज बोने के बाद पूरे खेत में पॉलिथीन डालकर उसे ढक दिया जाता है। नालियों में जहां जहां बीज डाली जाती है। वह पॉलिथीन को काट दिया जाता है। ताकि पौधे बाहर निकल आए। पॉलिथीन खेतों में डालने से किसानों को दो तरह के लाभ होते हैं। एक तो यह कि जो फल होते हैं वह जमीन नहीं छूते हैं। जिससे वह दागी नहीं होते है। दूसरे यह की खेतों में पॉलिथीन पड़ी रहने से घास नहीं उगती है। ऐसे में फसल का उत्पादन भी अधिक होता है। इसके साथ ही साथ खरपतवार को नियंत्रण पर होने वाला खर्च भी शून्य हो जाता है।
यूरोपियन कद्दू 56 की बाजारों में बहुत डिमांड, खीरे जैसा इसका आकार
यूरोपियन कद्दू की बाजारों में बहुत अधिक मांग है। इसके पीछे यह कारण है कि सामान्य कद्दू की जो प्रजातियां हैं। उनके फल 3 से 4 किलो से कम के नहीं होते हैं।
अन्य प्रजातियों के फल 10 से 15 किलो तक के होते हैं। इन फलों को दुकानदारों को काटकर बेचना पड़ता है। यूरोपियन कद्दू अधिकतम एक से डेढ़ किलो का होता है। खीरे जैसा इसका आकार होता है। ऐसे में कम खर्च वाले परिवार भी इसे बड़े चाव से खरीद लेते हैं।
सब्जी के डंठल मछलियां खाकर हो रही तैयार
मुन्ना ने अपने खेत में मत्स्य पालन के लिए तालाब खुदवाया है। जिसमें मछली की एक ऐसी प्रजाति डाली है। जो खरपतवार खाती हैं। मुन्ना बताते हैं कि खेतों से निकलने वाले सब्जी के डंठल को इन्हीं तालाबों में फेंक दिया जाता है। जो मछलियों के चारा के काम आता है। ऐसे में सब्जी के डंठल का भी उपयोग हो जाता है।
उपनिदेशक कृषि उद्यान बोले
उप निदेशक उद्यान डीके वर्मा ने बताया कादीपुर गांव निवासी मुन्ना ने अपने खेत में यूरोपियन 56 कद्दू लगाया है। इससे इनकी इतनी आए होने लगी है इन्होंने अपने खेत में मत्स्य पालन का भी काम शुरू किया है।
परंपरागत खेती छोड़ने के बाद इनकी आय दोगुनी हो गई है। इन्होंने अपने खेतों में ड्रिप सिंचाई संयंत्र भी लगाया है। जिससे फसलों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पानी मिलता है।
ऐसे में सिंचाई की लागत भी बहुत कम हो जाती है। इन्होंने अपने खेतों में मल्चिंग लगा रखी है। मल्चिंग का मतलब पॉलिथीन की सीट बिछा रखा है। जिससे खेतों में खरपतवार नहीं उग पाते हैं। एक बार मल्चिंग डालने के बाद सब्जी की दो फसल ली जा सकती है।
Published on:
18 Jan 2023 08:18 pm
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