
गोरखपुर। कर्नाटक में बीजेपी की नवनियुक्त सरकार को 24 घंटे में बहुमत सिद्ध करने का आदेश देकर राजभवन को कड़ा संदेश देने वाले सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय बेंच में शामिल न्यायाधीश अशोक भूषण अपने न्यायपूर्ण फैसलों के लिए जाने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहते हुए उन्होंने एक फैसला देकर पूरे प्रदेश में खलबली मचा दी थी। उन्होंने अपने फैसले से भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश देते हुए उच्चशिक्षण संस्थानों में नियुक्ति/प्रोन्नति के नाम पर गड़बड़ियों की गंगोत्री को साफ करने का काम किया।
यूपी में यह फैसला 156 डिग्री काॅलेजों को प्रभावित किया था
प्रदेश के डिग्री कॉलेजों में 2005 में 156 प्राचार्य के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला गया था। इस नियुक्ति प्रक्रिया के तहत 58 अंडरग्रेजुएट और 98 पीजी कॉलेजों के प्राचार्यो की नियुक्ति हुई थी। लेकिन नियुक्ति के पश्चात मिले आरटीआई में काफी गड़बड़ियां सामने आई। इनको आधार बनाकर डॉ.करुणानिधान उपाध्याय ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति के पश्चात प्राचार्याें की ज्वाइनिंग को रोका नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस शर्त के साथ नियुक्ति प्राचार्यों को ज्वाइन करने की इजाजत दी कि अगर फैसला खिलाफ में आता है तो नियुक्ति निरस्त मानी जायेगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एकल पद पर आरक्षण को खारिज करने के साथ नियुक्ति में धांधली की जांच और सुनवाई का जिम्मा हाइकोर्ट को सौंपा। कई सालों तक हुई सुनवाई के बाद 23 अप्रैल 2012 को चयन को अवैध माना। याचिका कर्ता बताते हैं कि इस मामले की सुनवाई करने वाले उच्च न्यायालय के तत्कालीन जज न्यायमूर्ति अशोक भूषण ही थे। लेकिन 10 मई 2012 को सुप्रीम कोर्ट में अपना अगला फैसला आने तक हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे दे दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई न्यायधीशों के बदलने की वजह से सुनवाई में लेट लगा। जनवरी 2016 से एक बार फिर इस मामले में सुनवाई शुरू हुई। 15 सुनवाइयों के बाद मई में कोर्ट ने निर्णय देकर उस फैसले को सुरक्षित रख लिया। 15 जुलाई को ऐतिहासिक फैसला देते हुए सारे 156 प्राचार्यों की नियुक्ति को ही अवैध करार दिया। इसके साथ ही नियुक्ति की तिथि से 15 जुलाई तक लिए गए अधिक वेतन को भी वापस लेने का आदेश दिया।
Published on:
19 May 2018 05:08 am
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