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ईलाज में देरी पर दिगामी बुखार एईएस का रूप धारण करताः कमिश्नर

दस्तक अभियान के लिए मीडिया कार्यशाला का भी आयोजन कर इंसेफेलाइटिस के बारे में दी गई जानकारी

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encephalitis

इंसेफेलाइटिस

गोरखपुर। कमिश्नर अनिल कुमार ने बताया कि उपचार मंे देरी होने पर दिमागी बुखार गंभीर रूप धारण कर सकता है, तब इसे एक्यूट इन्सिफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) कहा जाता है। जिसके कारण आजीवन अपंगता या मृत्यु भी हो सकती है।
मंडलायुक्त गोरखपुर में विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवाड़ा के बारे में मीडिया की कार्यशाला को सम्बोधित कर रहे थे। यह आयोजन जिला प्रशासन, यूनीसेफ तथा पाथ द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। उन्होंने कहा कि दिमागी बुखार या नवकी बीमारी एक संचारी रोग है जो मुख्य रूप से मच्छरों के काटने, दूषित जल पीने, माईट्स या चिग्गर के काटने आदि के कारण होता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि इस बीमारी की रोकथाम के लिए चूहे, छछूंदर, मच्छरों पर नियंत्रण, व्यक्तिगत तथा पर्यावरणीय स्वच्छता तथा स्वच्छ जल का सेवन जरूरी है। उन्होंने कहा कि बच्चों को जेई का टीका अवश्य लगवायें। घर के आस पास साफ सफाई रखें, पानी जमा न होने दें, सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें तथा स्वच्छ जल का प्रयोग करें।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष संचालित स्वच्छता अभियान एवं बीमारी से बचाव के लिए जागरूकता अभियान का परिणाम यह रहा कि मृत्यु दर में कमी आयी है। वर्ष 2013 में यह 20.39 प्रतिशत था जबकि 2017 में 12.64 प्रतिशत रहा। इसलिए हमें बीमारी से बचाव पर विशेष प्रयास करने की आवश्यकता है। इस वर्ष के जागरूकता अभियान में यूनीसेफ के जुड़ने से इसको और भी बल मिलेगा तथा लोगों में जागरूकता आयेगी तथा बीमारी से बचाव हो सकेगा।
उन्होंने कहा कि इस बीमारी का गोरखपुर व बस्ती मण्डल में काफी प्रकोप है परन्तु हम लोगों को जागरूक करके अधिक से अधिक जाने बचा सकते हैं। इस कार्य में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है। कई प्रमुख समाचार पत्र स्वच्छता अभियान संचालित करके लोगों में जागरूकता ला रहे हैं। उनसे अपेक्षा है कि वे जेई/एईएस से बचाव में अच्छा कार्य कर रहे कर्मचारियों, संस्थाओं के सफलताओं की कहानी अवश्य प्रकाशित करेंगे।
उन्होंने कहा कि विशेष संचारी रोग नियंत्रण पखवारा के अन्तर्गत 2 से 16 अप्रैल तक सभी गांव के स्कूल, चिकित्सालय एवं सामाजिक स्थलों पर जाकर क्षेत्रवासियों की जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करेंगे। इस कार्य में प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।
कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि जिलाधिकारी के. विजयेन्द्र पाण्डियन ने मीडिया प्रतिनिधियों से अनुरोध किया कि जेई/एईएस संबंधी खबरों में तथ्य व तकनीकी जानकारी का प्रयोग करें। क्षेत्र में जहां जहां एईएस/जेई केसेज में कमी आई है वहां के उदाहरण को अपने पाठकों तक पहुंचाये।
उन्होंने कहा कि इसके इलाज के लिए सभी पीएचसी/सीएचसी एवं जिला अस्पताल में सुविधाएं व स्टाफ उपलब्ध है। बुखार आते ही रोगी को तुरन्त यहां पर ले जायें। झोला छाप डाक्टरों के चक्कर में न पड़ें। झटका या मिर्गी जैसी गंभीर समस्या होने पर 108 एम्बुलेंस से अस्पताल ले जायें तथा बच्चे के ठीक होने तक उसका पूरा इलाज करायें।
उन्होंने बताया कि जागरूकता पखवाड़े के तहत स्वस्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, बाल विकास परियोजना, शिक्षा विभाग, कृषि विभाग, ग्राम्य विकास, पंचायती राज विभाग, पशुपालन विभाग, दिव्यांग विभाग, नगर निकाय आदि विभागों का समन्वित कार्य योजना तैयार करके गांव, कस्बों व शहर में अभियान संचालित किया जायेगा।
अपर निदेशक स्वास्थ्य डाॅ. पुष्कर आनन्द ने कहा कि जेई/एईएस से बचने के लिए व्यक्तिगत साफ सफाई पर ध्यान देना होगा। खुले में शौच न करें, साबुन से हाथ धोये, नाखून काटे, सर में जूं पड़ने से रोकें। सीएमओ डाॅ. रवीन्द्र कुमार ने कहा कि जेई का पहला टीका 9 माह से 12 माह के बीच तथा दूसरा टीका 16 से 24 माह के बच्चों को लगवायें। उन्होंने कहा कि अभियान के अन्तर्गत आशा बहू घर घर जाकर इसकी रोकथाम व उपचार के विषय में लोगों को जागरूक करेंगी। एक से 15 वर्ष के छूटे हुए बच्चों को जेई का टीका भी लगाया जायेगा।
यूनीसेफ की गीताली त्रिवेदी ने बताया कि गोरखपुर व बस्ती मण्डल के सभी 7 जनपदों में विशेष जागरूकता अभियान संचालित किया जायेगा तथा प्रचार प्रसार सामग्री का वितरण किया जायेगा। पाथ की कार्यक्रम अधिकारी डाॅ. शालिनी खरे दिमागी बुखार, कारण, उपचार और बचाव के बारे में जानकारी दिया। यूनीसेफ के संचार विशेषज्ञ भाई शैली ने दस्तक अभियान के बारे में बताया। कार्यशाला के दौरान ग्राम प्रधान, आगनवाड़ी कायकत्र्री, शिक्षिकाओं ने अपने अपने अनुभव बताये। कार्यशाला का संचालन डाॅ. सुखपाल ने किया।


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