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Success Story: 40 केचुओं ने बदल दी किसान की जिंदगी, अब है लाखों के टर्नओवर वाली 300 युनिट के मालिक

जैविक खाद बनाने की 300 इकायों में दे रहे हैं 200 लोगों को रोजगार सालाना करते हैं 10 हजार क्विंटल उत्पादन, जैविक कृषि को दे रहे बढ़ावा रिसर्च सेंटर में दूसरों को देते हैं वर्मी कम्पोस्ट बनाने की ट्रेनिंग

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vermicompost

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

गाेरखपुर/महाराजगंज. रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से बेजान हो रही खेतों की मिट्टी को नया जीवन देने और फसलों को जहरीले प्रभाव से मुक्त करने के लिए जैविक खाद अपनाने का संदेश देते हुए एक ग्रामीण किसान ने ऐसा व्यावसायिक नवाचार किया, जो क्षेत्र के लिए एक मिसाल बन गया है। महराजगंज जिले के नन्दना गांव के नागेन्द्र पांडेय ने महज 40 केचुओं से वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने की शुरुआत की जो आज इतना बड़ा व्यवसाय बन चुका है कि वह 200 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। उनके रिसर्च सेंटर से प्रशिक्षण लेकर लोग बड़े पैमाने पर जैविक खाद बनाने का काम कर रहे हैं। उन्हें 2015-16 में भूमि एवं जल संसाधन विभाग उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्मी कम्पोस्ट में उत्कृष्ठ कार्य के लिये पुरस्कृत किया जा चुका है।

प्रगतिशील किसान नागेन्द्र पांडेय बताते हैं कि सन 2000 में महज 40 केचुओं के साथ उन्होंने शौकिया वर्मी कम्पोस्ट बनाना शुरू किया। आज उनकी 300 इकाईयां चल रही हैं। यहां जैविक खाद तो बनाई ही जाती है नए लोगों को काम शुरू करने के लिये प्रशिक्षित भी किया जाता है। वह किसानों को जैविक क़ृषि के लिए जागरूक भी करते हैं।

नागेन्द्र ने बताया कि उन्होंने इसकी शुरुआत स्व प्रेरणा से की थी। आज यह उनकी आय का बड़ा स्रोत होने के साथ ही लोगों को रोजगार भी मुहैया करा रहा है। सरकार से इसमें कोई अनुदान या मदद नहीं ली। मेहनत-लगन के साथ-साथ उत्पाद की गुणवत्ता भी व्यवसाय में कामयाबी का मुख्य कारक है। शुरुआत भले ही छोटी थी, लेकिन गुणवत्ता से समझौता नहीं किया, लिहाजा बाजार में पकड़ बन गई और आज शौक न सिर्फ आय का साधन बना बल्कि कई लोगों के रोजगार का जरिया भी बन गया है।

बेटी संभालती है जैविक खेती ट्रेनिंग और रिसर्च सेंटर

नागेन्द्र पाण्डेय ने न सिर्फ वर्मी कम्पोस्ट की 300 इकाईयां स्थापित की हैं, बल्कि वह 3000 स्क्वायर फीट में जैविक खेती व खाद बनाने का ट्रेनिंग और रिसर्च सेंटर भी चलाते हैं। जिला प्रशासन ने उनके सेंटर से 45 महिलाओं को ट्रेनिंग दिलायी, जो आज वर्मी कम्पोस्ट बनाने का काम करती हैं और उनका सालाना टर्न ओवर एक से दो लाख रुपये है। इसे उनकी बेटी विजय नन्दिनी संभालती है। बेटी ने कृषि से एमएससी किया है और उन्नत खेती-किसानी को बखूबी समझती है। बेटे को भी उन्होने कृषि क्षेत्र में ही शिक्षा ग्रहण करायी है। वर्तमान समय में उनके पुत्र विजय नंदन पाण्डेय कृषि में प्रसार विषय पर पीएचडी कर रहे हैं।

10 हजार क्विंटर उत्पादन, लाखों का टर्न ओवर

नागेन्द्र पाण्डेय 300 इकाइयों से सालाना 10 हजार क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन करते हैं। जिसका वार्षिक टर्न ओवर 65 लाख रुपये से अधिक है। इसके अलावा रिसर्च और ट्रेनिंग सेंटर बनाया है। उनके ट्रेनिंग सेंटर में नए लोगों को वर्मी कम्पोस्ट जैविक खाद बनाने और जैविक खेती के तरीके सिखाए जाते हैं। बहुत सारे लोग यहां से ट्रेनिंग लेकर महाराजगंज और आसपास के जिलों में वर्मी कम्पोस्ट खाद से स्वरोजगार भी कर रहे हैं।

2 रुपये प्रति किलो से कम पड़ती है लागत

जैविक खाद का इस्तेमाल जहां फसलों की उत्पादकता बढ़ाती है वहीं यह खेतों की मिट्टी का भी पोषण करती है। यह पौधों के लिये एक पौष्टिक खाद है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार आता है और खेत अधिक उपजाऊ बनते हैं। इसे तैयार करना बेहद आसान और सस्ता है। यह दो रुपये किलो से कम लागत में तैया हो जाता है और चार से साढ़े चार रुपये किलो बिकता है।


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