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Independence day आजादी के दीवानों का यह मंदिर, हर साल आते हैं लाखों लोग अपना शीश झुकाने, मन्नत मांगने

जल्लाद के गिड़गिड़ाने पर वीर सपूत ने मां से गुहार लगाकर चढ़ गए फांसी अंग्रेज जहां जाने से कांप उठते थे

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Tarkulha devi mandir

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भारत मां की आजादी (The story of Indian Independence) का जब भी जिक्र आएगा तो पूर्वांचल के एक मंदिर भी आजादी के इतिहास में दर्ज मिलेगा। घने जंगलों में विराजमान तरकुलहा माई का मंदिर (Tarkulha Devi mandir) जो आजादी के दीवानों की शरणस्थली हुआ करती थी। यह एक ऐसी जगह थी जहां अंग्रेज जाना तो दूर की बात जेहन में यह सोचकर घबरा जाते थे। यह वही जगह है जहां भारत मां का वीर सपूर बाबू बंधू सिंह (Freedom Fighter Bandhu Singh) अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध करते हुए उनसे लोहा लेते थे। कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने धोखे से शहीद बंधू सिंह को पकड़े थे और फांसी देने लगे तो मजबूत से मजबूत फंदा टूटता गया। सात बार फांसी के फंदे पर चढ़ा चुका जल्लाद बाबू बंधू सिंह के सामने गिड़गिड़ाते हुए अंग्रेजों से अपनी जान की भीख मांगने लगा तो उन्होंने स्वयं प्रार्थना की और इस बार फांसी का फंदा नहीं टूटा।

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गोरखपुर से बीस किलोमीटर दूर देवीपुर गांव में मां तरकुलहा देवी का यह प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। (Tarkulha Devi Mandir is situated 20 km far from Gorakhpur in devipur village) घने जंगलों में मां की पिंडी के पास कभी आजादी के दीवानों का जमावड़ा होता था। आजाद भारत का सपना देखने वाले पूर्वांचल के मतवाले यहां अंग्रेजों के खिलाफ जंग की तैयारी करते थे। यहां के बारे में लोग बताते हैं कि अंग्रेजों का यहां के लोगों पर दिन-ब-दिन अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था। डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह के दिल में भी बेड़ियों में जकड़ी भारत मां को आजाद कराने का सपना धड़क रहा था। वह अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिए थे। क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि बाबू बंधू सिंह मां दुर्गा के भी बड़े भक्त थे।

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यह 1857 की बात है जब पूरे देश में आजादी के लिए वीरों ने अंगड़ाई ली थी(The first war of Indian Independence 1857)। बाबू बंधू सिंह भी यहां अपने क्षेत्र से आजादी का नारा बुलंद करते हुए इस महासंग्राम में कूद पड़े। लोग बताते हैं कि वह गुरिल्ला युद्ध में माहिर थे। घने जंगल में जाकर अपना ठिकाना बना लिया। वहीं रहने लगे और अंग्रेजों से लोहा लेने लगे। भारत मां की आजादी की लड़ाई लड़ने के साथ उन्होंने पूजापाठ के लिए भी एक जगह खोज ली। जंगल में ही गोर्रा नदी गुजरती थी। उसी जंगल में बंधू एक तरकुल के पेड़ के नीचे पिंडियों को बनाकर मां भगवती की पूजा करने लगे। कहा जाता है कि अंग्रेजों से गुरिल्ला युद्ध लड़ते और मां के चरणों में उनकी बलि चढ़ाते। अंग्रेज इस युद्ध में पराजित होने लगे। उनको समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा। आखिर उनके सैनिकों को क्या हो जा रहा। अंग्रेजों ने आसपास के क्षेत्र के ही कुछ लोगों को खबरी बनाया, लालच दिया। अंग्रेजों की चाल कामयाब हो गई। वजह पता चलते ही वे परेशान हो उठे। अब अंग्रेजों के लिए बाबू बंधू सिंह को पकड़ना एक चुनौती बन गया। कोई चाल कामयाब नहीं होती। एकदिन गोरों को बड़ी कामयाबी मिली, एक गद्दार ने बंधू सिंह की सटीक सूचना दे दी। अंग्रेजों ने जाल बिछाया और अंततः वह हिरासत में ले लिए गए।

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बाबू बंधू सिंह के 161वें शहादत दिवस पर नमन किया लोगों ने IMAGE CREDIT:

तरकुलहा देवी के भक्त बाबू बंधू सिंह पर अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया। अंग्रेज जज ने उनको फांसी की सजा सुनाई। फिर उनको सार्वजनिक रूप से फांसी देने का फैसला लिया गया ताकि कोई फिर बगावत न कर सके।
12 अगस्त 1858 को पूरी तैयारी कर बाबू बंधू सिंह के गले में जल्लाद ने जैसे ही फंदा डालकर लीवर खींचा फंदा टूट गया। छह बार जल्लाद ने फांसी पर उनको चढ़ाया लेकिन हर बार मजबूत से मजबूत फंदा टूटता गया। अंग्रेज परेशान हो गए। जल्लाद भी पसीनेे पसीने होने लगा। जल्लाद गिड़गिड़ाने लगा कि अगर वह फांसी नहीं दे सका तो उसे अंग्रेज फांसी पर चढ़ा देंगे। इसके बाद बंधू सिंह ने मां तरकुलहा देवी को गुहार लगाई और प्रार्थना कर कहा कि उनको फांसी पर चढ़ जाने दें। उनकी प्रार्थना के बाद सातवीं बार जल्लाद ने जब फांसी पर चढ़ाया तो उनकी फांसी हो सकी। इस घटना के बाद मां तरकुलहा देवी का महात्म दूर दराज तक पहुंचा और धीरे-धीरे भक्तों का रेला वहां पहुंचने लगा।