2 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

काकोरी कांड पर विशेष: नोएडा में तैयार हुए थे हथियार

टीकम सिंह राजा रामसिंह के छोटे पुत्र पढ़ाई के दौरान ही वे भगत सिंह व राजगुरु के संपर्क में आ गए और उन्होंने काकोरी कांड़ का षडयंत्र रच डाला

3 min read
Google source verification

image

Rajkumar Pal

Aug 09, 2017

kakori kand

वीरेंद्र शर्मा,
ग्रेटर नोएडा। दादरी के धूममानिकपुर गांव के टीकम सिंह राजा रामसिंह के छोटे पुत्र थे। बचपन से ही उनका मन पढ़ाई में कम, देश की आजादी में ज्यादा था। पढ़ाई के दौरान ही वे भगत सिंह व राजगुरु के संपर्क में आ गए और उन्होंने काकोरी कांड़ का षडयंत्र रच डाला। टीकम सिंह को काकोरी कांड का षडयंत्र रचने व अंग्रेजों हुकुमत के खिलाफ बगावत करने के जुर्म में आजावीन कारावास की सजा हुई। टीकम सिंह की पत्नी सत्यवती देवी सिकंदराबाद विधान सीट से पहली महिला विधायक चुनी गई थी। देश की आजादी के प्रति समर्पित टीकम सिंह की पत्नी के सामने किसी ने चुनाव लड़ने की हिम्मत न दिखाकर उनका समर्थन किया था।

टीकम सिंह ने छूआछूत के खिलाफ भी आवाज बुलंद किया। मंदिरों में दलितों को प्रवेश दिलाने में भी अहम भूमिका निभाई थी। उस दौरान राजा रामसिंह की रियासत हुआ करती थी। स्वर्ण जाति के लोग दलितों पर अत्याचार किया करते थे। लेकिन ये सभी जाति के लोगों को समान मानते थे।

मथुरा में रची दी थी साजिश और नोएडा में तैयार हुए थे हथियार

प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद में उन्होंने खुर्जा के राजकीय विद्यालय में एडमिशन लिया था। 14 साल की उम्र में ही उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद कर दी थी। ये वृंदावन के कंपाठियां कुंज में क्रांतिकारी हसरत महिनी से जुड़ गए। बताया जाता है कि उन दिनों यूपी के क्रांतिकारियों का कंपाठियां कुंज मुख्य केंद्र हुआ करता था। वहीं नोएडा के नलगढ़ा गांव में देशभक्त हथियार बनाया करते थे। यहीं से ही टीकम सिंह, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह व राजगुरु जैसे महान क्रांतिकारियों के संपर्क में आ गए।

युवाओं की टीम की थी तैयार

वृंदावन के कंपाठियां कुंज में क्रांतिकारी हसरत महिनी से जुड़ने के बाद में टीकम सिंह श्यामवीर सिंह, शत्रुसूदन, महताब सिंह, पन्नी लाल व हरीबाबू आदि युवाओं को क्रांतिकारियों को शामिल कर टीम बना ली। बताया गया है कि क्रांतिकारियों के गुट में एक युवक अंग्रेजों से मिला हुआ था। वह इनकी हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेजों को देता था। यहीं वजह रही है कि इन्हें जनवरी 1920 में खुर्जा के हॉस्टल से काकोरी षडयंत्र केस में गिरफ्तार कर आगरा जेल भेज दिया। इस दौरान इन्हें विभिन्न जेलोंं में रखकर अंग्रेजों ने यातनाएं दी। काफी टॉर्चर किया गया। कोर्ट में काकोरी कांड के आरोप में गिरफ्तार हुई इन देशभक्तों की सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया। कोर्ट में जुर्म साबित न होने पर जेल से रिहा कर दिया गया।

फांसी की जगह आजीवन कारावास की हुई सजा

करीब 2 साल बाद 20 सिंतबर 1922 को गिरफ्तार कर बुलंदशहर जेल भेज दिया गया। साथी शत्रुसुदन को फरुखाबाद और श्यामवीर सिंह को हाईस्कूल के एग्जाम देते हुए दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। इनके खिलाफ 109, 307, 302, 120 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर बरेली सेशन जज की कोर्ट में केस चला। 11 अप्रैल 1923 को कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई। अल्प आयु को देखते हुए आजीवन कारावास में सजा बदल दी गई। ये फैजाबाद, लखनऊ, बुलंदशहर व इलाहाबाद के नैनी जेल में रहे। इन्हें काल कोठरी में रखा गया था। जेल में बंद रहते हुए इन्होंने लखनऊ में आमरण अनशन तक किया। 35 साल की उम्र में आजीवन कारावास काटने के बाद में 1934 में रिहा हुए। उसके बाद भी क्रांतिकारियों से जुड़ और कई आंदोलन चलाए।

ये भी पढ़ें

image