
9वीं से 11वीं शताब्दी की मूर्तियां, विश्व का सबसे भारी झूमर ग्वालियर के संग्रहालय में
ग्वालियर.
संग्रहालय में प्रवेश के पहले टूरिस्ट की होगी तीन बार स्क्रेनिंग
मध्यप्रदेश का एक मात्र शहर ग्वालियर है, जहां पांच विख्यात म्यूजियम हैं। इनमें प्राइवेट और गवर्नमेंट संग्रहालय शामिल हैं। पांचों म्यूजियम के अट्रैक्शन भिन्न हैं। हर एक में नायाब चीजे हैं, जो विश्व में ग्वालियर को पहचान दिलाती हैं। इन म्यूजियम को देखने के लिए देश-विदेश से टूरिस्ट आते हैं। संग्रहालयों में उत्तर भारत शैली (नागर शैली) के अवशेष हैं, जो मंदिरों से प्राप्त हुए हैं। 9वीं से 11वीं शताब्दी की मूर्तियां, चांदी की ट्रेन, साढ़े तीन टन के झूमर, रानी लक्ष्मीबाई के अस्त्र-शस्त्र, उल्का पिंड, एलिफेंट के हेड का स्केलेटन, टाइगर की प्रिजर्व स्किन आदि बहुत से रहस्यों को छिपाए हुए हैं। भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान के असिस्टेंट प्रो. डॉ. चन्द्रशेखर बरुआ ने बताया कि हमारा ग्वालियर बहुत रिच है। यह मप्र में अकेला है, जहां पांच विख्यात संग्रहालय हैं। लॉकडाउन के चलते अभी संग्रहालय बंद हैं। ओपन होने पर टूरिस्ट की एंट्री गेट पर तीन बार स्क्रेनिंग के बाद हो सकेगी।
16 कैदियों ने 12 साल में तैयार किया था रेड कॉरपेट
हिस्ट्री- जयविलास पैलेस हिंदुस्तान में राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख स्थान रखता है। पैलेस का एक हिस्सा इटालियन स्टाइल आर्किटेक्चर है। इसक निर्माण 1874 में मिकेल फिलोजी, चीफ आर्किटेक्ट ने किया था। महल में 400 कमरे हैं, जिनमें 40 कमरों में महाराजा सर जीवाजी राव सिंधिया म्यूजियम नाम दिया गया। पैलेस की स्थापना 1964 में की गई।
खासियत- पैलेस का दरबार हाल और डायनिंग हाल मुख्य आकर्षण हैं। दरबार हॉल में एशिया का सबसे बड़ा कालीन है, जिसका साइज 100 बाय 60 फीट है। यह सिंगल पीस कॉरपेट है। इसे 16 कैदियों ने 12 साल में बनाकर तैयार किया था। दरबार हॉल में विश्व के सबसे बड़े और सबसे भारी दो झूमर है। एक झूमर का वजन साढ़े तीन टन यानि साढ़े तीन हजार किलो है। कहा जाता है कि झूमर टांगने से पूर्व 8 हाथियों को रैम्प के माध्यम से चढ़ाकर रूफ को टेस्ट किया गया था। एक झूमर में 248 बल्ब हैं। डायनिंग टेबल में चांदी की ट्वॉयज ट्रेन है। इसमें 7 क्रिस्टल बॉटल हैं। इनमें मेहमानों के लिए लिकर, ड्रायफ्रूट एवं सिगार रखा जाता था। इसके चारो ओर लगी टेबल में बैठे शाही मेहमान जब कोई समान उठाते तो यह ट्रेन रुक जाती थी। पैलेस में एक चांदी की बग्घी है, जिसमें 48 केजी चांदी का यूज किया गया है। इसे महाराजा जीवाजी राव एवं पूर्व की तीन पीढिय़ां दशहरे के साही रथ यात्रा में प्रयोग करते थे।
पौने दो करोड़ से संवर रहा गूजरी महल
हिस्ट्री- गूजरी महल का निर्माण 15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के शुरुआत में किया गया था। राजा मानसिंह तोमर ने अपनी रानी मृगनयनी के लिए हिंदू शैली में 28 कमरे के शाही महल का निर्माण कराया था। 1922 में एमवी गर्दे ने इस महल को संग्रहालय में तब्दील किया।
खासियत- गूजरी महल में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से लाए हुए स्कल्प्चर स्थापित हैं, जो हिंदू, बुद्ध और जैन धर्म के हैं। ये उत्तर भारत शैली (नागर शैली) के अवशेष हैं, जो मंदिरों से प्राप्त हुए हैं। इस महल में दो अंडरग्राउंड फ्लोर हैं। एक समय में बैजू बावरा की संगीत कक्षाएं मृगनयनी के लिए आयोजित की जाती थीं। विश्व में पहचान रखने वाली शॉल भंजिका भी यहीं है, जिसे ग्यारसपुर लेडी व इंडियन मोनालिजा के नाम से भी जाना जाता है। यहां बाग केव पेंटिंग की प्रतिकृति व मुगल शासकों की पेंटिंग भी देखने को मिलती है। टेराकोटा वर्क की गैलरी भी आकर्षण का केन्द्र है। एक गैलरी में विभिन्न भाषाओं के भी पत्थर रखे हुए हैं। महल की ओपन गैलरी में डांसिंग गणेश, अप्सराएं, भगवान विष्णु के तीसरे अवतार वराह, हरिहर और अर्धनारीश्वर के स्कल्प्चर भी आकर्षण का केन्द्र हैं। समय-समय पर यहां स्टूडेंट्स एवं रिसर्चर्स शोध के लिए आते हैं। इसे लगभग पौने दो करोड़ की लागत से संवारा जा रहा है।
संग्रहालय में एलिफेंट के हेड का स्केलेटन
हिस्ट्री- नगर निगम म्यूजियम सिंधिया रियासत कालीन के समय गेस्ट हाउस के रूप में यूज होता था। इसें बाद में सिंधिया परिवार ने स्टेट गवर्नमेंट को संग्रहालय के लिए गिफ्ट किया, जिसे कुछ समय बाद नगर निगम को सौंप दिया गया। अब नगर निगम ही इसका पूरा रख-रखाव कर रही है।
खासियत- नगर निगम म्यूजियम मोतीमहल परिसर के क्षेत्र में स्थापित है। इसमें प्रुख रूप से 1857 की क्रांति में रानी लक्ष्मीबाई के अस्त्र शस्त्र रखे हुए हैं। यहां उस समय के ब्रिटिश अखबार मिलते है और ब्रिटिश पीरियड के ऑफिसर के मेडल रखे हुए हैं। संग्रहालय में एलिफेंट के हेड का स्केलेटन डिस्प्ले किया गया है। साथ ही टाइगर और लेपर्ड सहित विभिन्न प्रजातियों की प्रिजर्व स्किन को डिस्प्ले किया गया है, जो आकर्षण का केन्द्र है। यहां व्हाइट पिकॉक, गिद्द की प्रिजर्व स्किन रखी है। इसमें हाथी के दांत का बना इमामबाड़ा है। सिंधिया राजवंश की चांदी की कुर्सी है। यहां 10वीं और 11वीं शताब्दी के स्कल्प्चर देखने को मिलते हैं। सेरेमक वर्क पॉट का अच्छा कलेक्शन दिखाया गया है। ग्वालियर के समीप एक गांव में वर्षों पहले गिरे उल्का पिंड को सहेज के रखा गया है, जिसके गिरने से काफी गहरा गड्ढा हो गया था। साथ ही ग्वालियर की पहली कार भी यहां की शोभा बढ़ा रही है।
गेस्ट हाउस से डिस्पेंसरी और फिर बना म्यूजियम
हिस्ट्री- 1881 से 83 के बीच ब्रिटिश मेजर जेबीकीथ का अपॉइनमेंट ऑर्किटेक्ट के रूप में हुआ था। उस समय ग्वालियर किले के स्मारकों का रख रखाव होना था। जिसका बजट 7 हजार 625 रुपए था। इसमें 4 हजार का कंट्रीब्यूशन सिंधिया रियासत ने किया। इसमें इंग्लिश बैरक तैयार हुआ, जो बाद में म्यूजियम में कन्वर्ड हुआ।
खासियत- एएसआई म्यूजियम में तीन गैलरी है। यहां शहर के 100 किमी एरिया में फैले प्राचीन मंदिरों की टूटी हुई मूर्तियों को लाकर रखा गया। इसमें प्रमुख रूप से पड़ावली, मिटावली, बटेसर, ककनमठ, सिहोनिया, नरेशर आदि के हिंदू, जैन एवं बुद्ध धर्म के मंदिरों की मूर्तियां खंडित स्थिति में लाकर रखी गईं। यहां भगवान विष्णु के दस अवतार, शिव को कई रूपों को दिखाया गया है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरो को रखा गया है। म्यूजियम की इस जगह को ब्रिटिश पीडियड में जेल के रूप में प्रयोग किया गया। इसके बाद ब्रिटिश पीरियड में इसे डिस्पेंसरी के रूप में उपयोग किया गया और देश आजाद होने के बाद इसे संग्रहालय के रूप में स्थापित किया गया। ग्वालियर फोर्ट स्थिति इस म्यूजियम को देखने के लिए काफी संख्या में टूरिस्ट पहुंचते हैं।
संगीत प्रेमियों के लिए खुलेगा सरोद घर
हिस्ट्री- सरोद घर ग्वालियर संगीत घराने के प्रख्यात सरोद वादक उस्ताद हाफिज अली खान के पूर्वजों का निवास हुआ करता था। वे अफगान से आए थे, जो बंगत फैमिली के नाम से जाने जाते हैं। वे अपने साथ रबात लेकर आए, जिसे मोडिफाई करके सरोद नाम दिया गया।
सरोद घर में संगीत वाद्य यंत्र शोभा बढ़ा रहे हैं। यहां देश के प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीतकारों के वाद्य यंत्र भी रखे गए हैं। इनमें तबला, हारमोनियम, सितार, वीणा, बांसुरी, मृदंगम आदि का डिस्प्ले किया गया है। उस्ताद हाफिज अली खान के पुत्र उस्ताद अमजद अली खान द्वारा मप्र शासन के सहयोग से म्यूजियम ऑफ म्यूजिकल इंस्ट्रुमेंट के नाम से सरोद घर को पहचान मिली। सरोद घर में रिनोवेशन का काम लगभग पूरा हो चुका है। इसके फ्लोर पर सैंड स्टोन के टायल्स लगाने के साथ ही शो केस बनाए गए हैं, जिनमें वाद्य यंत्रों का डिस्प्ले किया जा रहा है। साथ ही आने वाले पर्यटकों को जानकारी भी दी जाएगी। अभी तक सरोद घर में सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, केआर नारायणन, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम शिरकत कर चुके हैं।
Published on:
17 May 2020 10:01 pm
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