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‘रावण एक अपराजित योद्धा’ में बताया कैसे एक अहंकारी रावण नियति को स्वीकार कर लेता है

'Ravana Ek Aprajit yoddha' play- कला समूह में नाट्य महोत्सव का पहला दिन, लेखक शैलेंद्र तिवारी के उपन्यास 'रावण एक अपराजित योद्धा' पर आधारित नाटक का मंचन...।

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Ravan Ek Aprajit Yoddha play- कला समूह ने 60वीं वर्षगांठ एवं महिला रंगकर्मी पांचाली वर्धन की स्मृति में तीन दिवसीय नाट्य महोत्सव का आयोजन शुक्रवार से आरंभ हुआ। महाराज कुमार हौजाई गंबा सिंह के निर्देशन में पहले दिन झांसी रोड स्थित कला समूह परिसर में शैलेंद्र तिवारी रचित 'रावण एक अपराजित योद्धा' पर आधारित नाटक का मंचन किया गया। इसमें दिखाया गया कि नियति को नियंत्रित करने वाला रावण स्वयं ही किस तरह अपनी नियति को स्वीकार करता है। शनिवार शाम 7.45 बजे 'कल की सुबह' नाटक का मंचन होगा।

अक्षय सिंह तोमर- रावण, पवन- राम और सैनिक, पवन शाक्य-लक्ष्मण और सैनिक, मोहित- मायासुर, अमरदीप- जनक, मर्यादा तोमर - सीता और वेदवती, क्षमा खोटमं दोदरी, बॉबी दिनकर -शुक्राचार्य और सूत्रधार, आशीष मालेसहस्त्रबाहु, वैशाली एम.सक्सेना, सहस्त्रबाहु की माता, अमन-सैनिक, मोना- सैनिक, गोविंद राजपूत - रावण साधु वेश में, बादल- अंगद एवम सैनिक।

BOOK: अपराजित है रावण, लक्ष्य को हासिल करने में हुआ था सफल

रावण एक अपराजित योद्धा, लेखक शैलेन्द्र तिवारी के उपन्यास पर आधारित नाटक है। रावण विद्वान है, बलशाली है। नौ ग्रह भी उसके इशारे पर अपनी गति बदल देते हैं। ऐसा प्रतापी, भूत और भविष्य का ज्ञाता रावण मृत्यु को क्यों प्राप्त हुआ। विष्णु के दो द्वारपाल जय और विजय श्रापित होकर मृत्युलोक में रावण और कु्भकर्ण के रूप में जन्म लेते हैं ताकि अपने आराध्य नारायण के हाथों मुक्ति को प्राप्त कर सके। रावण मंदोदरी से यह जानते हुए भी विवाह करता है कि मंदोदरी की प्रथम सन्तान ही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। रावण की युवावस्था में विष्णु को आराध्य मानने वाली तपस्विनी वेदवती रावण को श्राप देती है कि वह अपने शरीर का त्याग कर रही है, लेकिन फिर जन्म लेकर आएगी और रावण की मृत्यु का कारण बनेगी।

रावण सहस्त्रबाहु द्वारा बंदी बनाया जाता है। इसी बीच पुष्पक विमान से मंदोदरी के साथ जनकपुर क्षेत्र में रावण के भ्रमण करते समय मंदोदरी का गर्भ गिर जाता है जिसे मंदोदरी वहीं छोड़ देती है जो बाद में जनक को प्राप्त होती है और सीता के रूप में जानी जाती है। रावण अपनी पराजय की पूजा आचार्य के रूप में स्वयं स्पन्न कराता है। राम से दक्षिणा के रूप में अपनी मृत्यु के समय राम की अपने पास उपस्थिति की मांग करता है। इस प्रकार नियति को नियंत्रित करने वाला रावण स्वयं ही अपनी नियति को स्वीकार करता है।