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प्रॉपर्टी के नाम पर फर्जीवाड़ा: मकान का सपना, बना धोखे का आसान धंधा

सस्ती जमीन और मकान बेचने का झांसा देकर हर रोज हो रही ठगी

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प्रॉपर्टी के नाम पर फर्जीवाड़ा: मकान का सपना, बना धोखे का आसान धंधा

प्रॉपर्टी के नाम पर फर्जीवाड़ा: मकान का सपना, बना धोखे का आसान धंधा

ग्वालियर. सस्ती जमीन और मकान बेचने का झांसा धोखेबाजी का जरिया बन चुका है। शहर में प्रॉपर्टी के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले तेजी से बढ़े हैं। ठगी करने में छोटे जालसाजों के साथ बड़े बिल्डर और सुसाइटी भी शुमार हैं। कानून के जानकार कहते हैं सस्ते का लालच भी लोगों को फंसा रहा है। कीमत कम है यह सुनकर ज्यादातर लोग सौदेबाजी के लिए जरूरी कायदों को खुद नजर अंदाज करते हैं। ठग इसका फायदा उठाते हैं।
हर दिन शिकायत, ठगे जाने पर एहसास
पुलिस के सामने लगभग रोज जमीन और मकान के सौदे में जालसाजी का मामला सामने आता है। ज्यादातर लोग जमीन या मकान पर मालिकाना हक लेने जाते हैं तब उन्हें ठगी का एहसास होता है। मौके पर सामने आता है जिस जमीन को अपना समझ रहे हैं वह तो दूसरे की है। उसका सौदा करने वाले उन्हें धोखा दिया है। तब तक खरीदार पैसा ठगों को थमा चुके होते हैं। ऐसे मामलों की विवेचना कर रहे पुलिस अधिकारी कहते हैं, ठग तो शिकार की तलाश में रहते हैं। लेकिन खरीदारों की लापरवाही उनके लिए मुसीबत साबित होती है।
इस तरह फरेब में फंसने से बचें
रिटायर्ड निरीक्षक रवि गर्ग कहते हैं जमीन या मकान बेचने वालों के द्वारा बनवाए ब्रोशर पर भरोसा करने की बजाए मौके की अपने स्तर पर जांच और प्रोजेक्ट में संपति खरीद रहे दूसरे खरीदारों से संपर्क करना जरूरी है। इसके अलावा प्रोजेक्ट में उन बैंक का ब्यौरा भी लेना चाहिए जो खरीदारों को ऋण मुहैया करा रही हैं। फाइनेंसर प्रतिष्ठि बैंक है तो उसके जरिए प्रोजेक्ट की स्थिति पता की जा सकती है। भूअभिलेख के जरिए ऑनलाइन स्थिति का पता लगाया जा सकता है।
इनके झांसे में फंसे खरीदार
चार चतुर एसोसिएट पर 100 से ज्यादा लोगों को सस्ता मकान देने का वादा कर ठगने का आरोप लगा चुके हैं। जैतल कंस्ट्रक्शन और विडंसर हिल्स एसोटेक प्राइवेट लिमिटेड के कंस्ट्रक्टर के खिलाफ भी खरीदारों से ठगी के केस दर्ज हैं। इसके अलावा जमीन के सौदे में धोखे की करीब 150 से ज्यादा शिकायतें विवेचना में हैं।

इस लापरवाही से ठगे जाते खरीदार
-जमीन और मकान का सौदा करते वक्त सिर्फ विक्रेता की बातों पर भरोसा करना।
-मौके पर जाकर स्थिति को देखने की बजाए बिल्डर के द्वारा बनाए कागजी प्रोजेक्ट पर विश्वास।
-सरकारी रिकार्ड में जमीन और मकान के बारे में जानकारी नहीं जुटाना।